म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

शुभ दीपावली (लघुकथा) -सुजाता भट्टाचार्य


दरवाज़ें की घंटी बजते ही अरूण का बेटा वरूण उस ओर लपका । अरूण अचंभित सा उसकी इस फुर्ती को देख रहा था। दरवाज़ा खुलते ही वहां एक पैकेट लिए कोरियर वाला खड़ा था। वरुण ने झटपट पैकेट ले लिया और कमरे में आकर उत्सुकता से उसे खोलने लगा।

अरुण भी नज़दीक आकर देखने लगा।उस पैकेट में से एक टी -शर्ट निकला जिसे उसके बेटा पहन कर देखने लगा। अरुण ने बेटे से पूछा,"ये टी-शर्ट अभी क्यों मंगवाई है?" अभी पिछले महिने ही तो दीपावली पर तुम्हें दो जोड़े कपड़े दिलवाए थे। 

यह सुनकर बेटे ने लापरवाही से जबाब दिया-"अरे पापा! आप भी क्या बात करते हैं,वो तो पिछले महिने की बात थी।" जबाब सुनकर अरुण को अपना बचपन याद आ गया जब पूरे साल में सिर्फ एक या दो बार ही उनको नए कपड़े मिलते थे, वो भी उनके पिता या दादा-दादी की पसंद के।

एक जन्मदिन और दूसरे दीपावली पर। यही कारण था कि दीपावली के एक महीने पहले सभी बच्चे एक-एक दिन गिनते थे। पिताजी या दादा जी जब भी घर लौटते तब बच्चों का ध्यान उनके हाथ के पैकेट की तरफ़ ही रहता था। रात को सपने में भी वे नए कपड़े ही देखते थे। उन कपड़ों के डिज़ाइन और रंग की कोई चिंता नहीं होती थी, चिंता तो सिर्फ इतनी होती थी कि बस नए कपड़े मिलेगें और जिस दिन पिता जी हाथ में कपड़े का पैकेट लेकर आते और हमें थमाते उस दिन तो बस हम बच्चों के पांव ज़मीन पर नहीं पड़ते थे।

आज अपने बच्चे जब हर रोज़ नए कपड़े खरीदते और पहनते हैं तो भी उनके चेहरे पर वो खुशी नहीं दिखती जो उस समय साल में एक बार दीपावली पर नए कपडें मिलने पर हमें होती थी।पूरे एक साल के इंतज़ार के बाद ही वो शुभ दिन 'शुभ दीपावली' का आता था जो उन्हें नए कपड़ों की सौगात दे जाता था।

-सुजाता भट्टाचार्य,दिल्ली

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