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इक्कीसवी सदी के हिंदी साहित्य में- सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ (शोध-पत्र )

डॉ. माया दुबे
बीसवी सदी के अवसान एवं इक्कीसवी सदी के आगमन पर हमें लग रहा था कि आने वाली सदी मे सबकुछ चमत्कारिक रूप से बदल जाएगा। मीडिया ने भी आग में घी का काम किया, अत्यधिक प्रचार-प्रसार किया। हम एक खुशफहमी पाले जीते रहे, धूमिल जी के शब्दों में कहें तो- 
“भीड़ बढती रही, 
चौराहे चौड़े होते रहे, 
लोग अपने-अपने हिस्से का अनाज, 
खाकर निरापद-भाव से, 
बच्चे जनते रहे। 
परिवर्तन एक प्राकृतिक नियम है, इस क्रम मे कुछ छूटता है तो कुछ जुड़ता है। समाज की सत्प्रकृति नहीं है कि वह सार-सार ग्रहण करे, थोंथा (कचरा) उड़ा दे। वह सभी को आत्मसात करता है। 
वैश्विकरण के दौर में दूसरे संस्कृतियों की घुसपैंठ होती रही, वह समाज मे अपना जगह बनाती रही, खान-पान, रहन-सहन, धार्मिक अनुष्ठानों मे भी एक बदलाव आया। समाज का एक विद्रूप रूप भी साहित्य में उभरने लगा। 75वी के बाद साहित्य में सत्तावाद, पूंजीवाद, बाजारवाद सभी दखल देने लगे। 
यथार्थ निरूपण के नाम पर कुत्सित एवं गर्हित विषय भी साहित्य में स्थान लेने लगे। ‘सर्वजन हिताय’ की भावना न जाने कहाँ लुप्त होती गई। साहित्य राजनीति का अखाडा बन गया, दलबंदी और गुटबंदी चरम पर पहुच गई, भ्रष्टाचार, भाई, भतीजावाद, प्रांतवाद, जातिवाद साहित्य में दखल देने लगे। लोकतंत्र में ‘लोक’ कही तिरोहित हो गया ‘तंत्र’ सर्वत्र प्रभावी हो गया। सामाजिक ढाँचा चरमराने लगा। सूखती हुई मानव संवेदना समाज एवं संस्कृति के लिए एक चुनोती बन गई। ऐसे में पनपता हिंदी साहित्य विविध आयामी हो गया, एक बदलाव के दौर का सर्वत्र अनुभव हुआ। विश्वनाथ तिवारी जी के शब्दों में बेरोजगार का भाव द्रष्टव्य है- 
“क्योकि नौकरी इस जन्म में ज़रूरी है। अत: प्यार को अगले जन्म के लिए स्थगित करता हूँ।” बदलते सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्यों का दर्शन है। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, शोषण, दमन हिंसा, भ्रष्टाचार, जुर्म आदि से घिरे रहने पर भी आधुनिक कवियों की अदम्य आशा, विश्वाश और जीवन शक्ति, साधारण जनता में आशा का सन्चार करती है- 
“जो जीवन का धूल चाटकर बड़ा हुआ है, 
तूफानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है, 
जिसने सोने को खोदा, लोहा गोड़ा है, 
जो रवि के रथ का घोड़ा है, 
वह जन मारे नहीं मरेगा, नहीं मरेगा। 
इस प्रकार इक्कीसवी सदी का साहित्य खड़ा है, - केदारनाथ अग्रवाल (गुलमेहदी, पृ. 131) तूफानो के साथ जूझ रहा है, नित-नित परिवर्तन के साथ भी आकर ले रहा है रच रहा है, नई संस्कृति नया समाज। 
इक्कीसवी सदी से तात्पर्य- 
लगभग एक दशक से आजकल संगोष्ठी, सेमिनार या लेखन में दो-तीन शब्द अत्यधिक प्रचलित है। इक्कीसवी सहस्त्राब्दी और नई सदी, परन्तु इन शब्दों में बुनियादी अंतर है। ‘इक्कीसवी सदी’ से तात्पर्य है बीसवी सदी के बाद का समय। इसमें इक्कीसवी पर जोर ज्यादा है, और यह शब्द उसी की और अभिमुख भी है, जबकि सहस्त्राब्दी ‘हिंदी साहित्य’ के इतिहास के व्यापकता का सूचक है। नई सदी तो पुरानी सदी के तौर पर कथित है। आज के नामकरण के दौर में ‘स्त्री-विमर्श’ ‘दलित-विमर्श’ काव्य की विशेष विधा के आधार पर हो रहे हैं। 
इक्कीसवी सदी को शुरू हुए अभी बारह साल होने वाले हैं, इन बारह सालों के साहित्य लेखन के आधार पर पिछले 88 वर्षों के साहित्य के बारें में कुछ कहना सही नहीं है। नि:संदेह इन बारह सालों में जो परिवर्तन की गति रही है, वह पिछले 25 वर्षो में भी नहीं दिखी लेकिन बीसवी सदी भी कम उथल-पुथल युक्त नहीं रहा। इधर के कुछ वर्ष हिंदी साहित्य के कुछ विमर्शो के नाम रहे, ‘उत्तर आधुनिकता’, ‘भूमंडलीकरण’ ‘दलित एवं स्त्रीविमर्श जो बीसवी सदी के उतरार्ध से उदित होकर इक्कीसवी सदी में पहचान बना लिए। राजेंद्र यादव जैसे साहित्यकारों ने डंके की चोट पर एलान करना शुरू कर दिया कि यह सदी स्त्री एवं दलित की होगी। लेकिन कोई भी प्रवृत्ती स्थाई नहीं होती, पुरानी सदी इसका उदाहरण है, बदलाव शाश्वत नियम है। अत: हम भविष्य की परिभाषा नहीं दे सकते। परिभाषा हमेशा घटित या बीते हुए की, की जाती है, आने वाला कल कौन सा रुख लेगा पता नहीं, ऐसे में 21वी शताब्दी को महिला विमर्श या दलित विमर्श पर केन्द्रित करना या भविष्यवाणी करना, हवा में तलवार चलाना है। 
फिर भी 21वी सदी नि:संदेह संभावनाओं का आधार है,ऐसे कई प्रश्न हैं, जो इस सदी में विचारणीय होंगे। नूतनता का ग्रहण, परन्तु प्राचीनता का आधार आवश्यक है। वस्तु, नेता, रस, छन्द में बदलाव, परन्तु मौलिकता बनी रही। साहित्य के मूल उददेश्य विखंडित न हों। भारत की विश्ववन्धुत्ववाद की परिकल्पना का पोषण इस सदी में होने की सम्भावना है। 
सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ
रचना का सामाजिक सरोकार अति प्राचीन है। समाज साहित्य का ‘दर्पण’ है, ‘मशाल’ है, ‘पद्प्रदर्शक’ है इत्यादी कथन इसी ओर इशारा करते हैं। कवि भी एक सामाजिक प्राणी है, उसी समाज में वह भी रहता है, संस्कृति से वह भी अभिप्राणित है अत: समाज के बदलाव का असर उस पर पड़ना अति स्वाभाविक है। समय की गति, चेतना, जीवनमूल्य, गिरावट, लालसा, महत्वकांक्षा, सभी का प्रभाव लेखन पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष अवश्य दिखाई देता है। राकेश रंजन की कविता ‘मजूर’ द्रष्टव्य है— 
‘बेढंगे पग उसके नंगे है, कटे छिले, 
उनमे अँधियार भरे राहों की धूल है। 
कहते हैं, उसी से सियासत की रौनक है।’ 
-बहुवचन (जु.सि.)2009 
दु:खों से जूझता आदमी, संघर्षरत आदमी, रोजी रोटी के लिए तड़फता आदमी, सभी 21 वीं सदी के कथावस्तु है। लेखक यथार्थ निरूपण में कोताही नहीं बरतता। अशोक बाजपेयी जी के शब्दों में- 
‘दु:ख चिट्ठीरसा है 
हमें खबर देता है, 
अपने होने की ।’ 
नई सदी का कवि चमत्कारों एवं भ्रम पैदा करने वालों आकर्षणों में नहीं बंधा है। इक्कीसवी सदी के हिंदी साहित्य के लेखन में कुछ कवियों को हम जोड़ सकते हैं जैसे- वसन्त त्रिपाठी, प्रेमरंजन, बोधिसत्व, श्रीप्रकाश शुक्ल, बद्री नारायण, ऐसे सैकड़ों नाम गिनाये जा सकते हैं, जो आने वाली सदी के हस्ताक्षर होंगे, जो बेबाकी से लिख रहे हैं, समाज का कच्चा चिट्ठा, मान्यताओं की खोखली तहें, ढकोसलों के अंबार को उधाड़ रहे हैं। आदिवासी लेखिका निर्मला पुतुल के शब्दों में- 
‘ और अगर किसी तरह हारी इस बार भी, 
तब कर लो नोट दिमाग की डायरी में, 
आज की तारीख के साथ, 
कि गिरेगी जितनी बूंदें धरती पर, 
उतनी ही जन्मेगी ‘निर्मला पुतुल’ 
हवा में मुट्ठी बांधे लहराते हुए।’ 
नगाड़े की तरह बजते हैं शब्द 
निर्मला पुतुल। 
यह चैलेंज है नई साईं के स्त्री लेखिकाओं का, तभी यह सदी बेबाक आत्मसंस्मरण एवं आटोबायोग्राफी की भी सदी बनने वाली है। कवि गुमनाम नहीं होगा, जन्म स्थान खोजने पर विमर्श नहीं होगा, हमथे, हम हैं, हम रहेंगे का नारा बुलंद होगा। 
नई सदी के पहले दशक के महत्वपूर्ण सामाजिक तनाव, संवेदनाओं को भी कवि बहुत सलीके से अभिव्यक्ति प्रदान कर रहा है। वैज्ञानिक सोच के परिणामस्वरूप धर्म और ईश्वर को कसौटी पर कसना वर्तमान में आवश्यक था, ईश्वर यदि है तो यहीं मिलता है, ईश्वर कलेंडरों तक सीमित हो गया है- 
“तुम किताबों से उठकर बार-बार 
यहाँ क्यों चले आते हो। 
हमने तुम्हें कलेंदारों पर दे दिया है, 
जाओ जूतें और घड़ियों के ऊपर रहो, 
आदमियों के ऊपर इस वक्त ख़तरा है।” 
लीलाधर जगूड़ी, 
(रात अब भी मौजूद है, पृ. 65) 
आम आदमी छला जा रहा है, आधुनिक लोकतंत्र ने भीड़तन्त्र बनकर भ्रामक स्थिति पैदा कर दी है। इन बातों का जिक्र केदारनाथ अग्रवाल की कविता ‘श्रम का सूरज’ में आया है- 
‘ सब चलता है लोकतंत्र में 
चाकू, जूता, मुक्का-मूंसल और बहाना....। 
भूल भटककर भ्रम फैलाये, 
गलत दिशा में, दौड़ रहा है, बुरा जमाना। 
यह बुरे ज़माने का जिदर सामाजिक सन्दर्भ की ही उकेरना है, जिसका बेबाकी से चित्रण इस सदी में हुआ है। रघुवीर सहाय का गिरते मूल्यों पर कटाक्ष दृष्टव्य है- 
‘ पढ़िये गीता, बनिये सीता, 
फिर इन सब में लगा पलीता, 
किसी मुर्ख की हो परिणीता, 
निज घर-बार बसाइये।’ 
सीढ़ियों पर धुप, पृ.149 
इक्कीसवी शताब्दी की सबसे बड़ी त्रासदी भ्रष्टाचार रही है, इस पर भी खुलकर कवियों ने कटाक्ष किया है, गिरते हुये सांस्कृतिक मूल्य ही इसके जिम्मेदार हैं। श्रीकांत जोशी जी ने ऐसे ही त्वालंत प्रश्न को अपनी कविता ‘किसी भी तारीख को’ में उठाया है- 
‘आज सब जगह विभागों में, 
लोग तनख्वाह सरकार से लेते हैं, 
और पैसा नागरिकों से, 
गरजमंदों से लेते हैं, 
अपनी ऊपरी आमदनी की चर्चा, 
सरे आम करते हैं।’ 
इक्कीसवी सदी मन बदलते सामाजिक, सांस्कृतिक मूल्य लेखन पर प्रभावी हो रहे हैं, यदि यहीं हाल रहा तो आने बाला लेखक कुंठा एवं हताशा में शब्दों की संस्कृति भी भूल जाएगा, जैसा कि बहुत से रचनाकार कर रहे हैं। विकृत मनोभाव, कुंठा हताशा से मुक्त होकर, एक बदलाव का प्रयास भी हो रहा है। दुष्यंत कुमार के शब्दों में- 
‘हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए। 
इस मिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए, 
आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी, 
शर्त लेकिन है कि यह बुनियाद हिलनी चाहिए।’ 
साये में धुप, पृ.62 
निश्चित समय बदलाव का आ गया हैं, 21 वीं सदी एक नई धारा की तरफ मुड़नी चाहिये, हिंदी साहित्य एवं आलोचना को एक दिग्दर्शन की आवश्यकता है। परिवर्तन सदैव बहुआयामी होता है। यह भी परिवर्तन का दौर है, कविता विविध मोड़ों से गुजर रही है।
 
उपसंहार- 
इस प्रकार 21 वीं सदी अनेक संभावनाओं की सदी है। आज का लेखक या कवी, तमाम संसाधनों से पूर्ण है। विश्व सिमट कर उसके क़दमों में आ गया है। बदलते दौर में भी एक उम्मीद एक आस एक विश्वास है। जिस उत्साह से आज लेखन कार्य में लोग प्रवृत्त है, वह नि:संदेह स्वागत योग्य है। समाज एवं संस्कृति का स्पष्ट झलक रचनाकार प्रस्तुत कर रहा है। यह सदी पूर्ण आशा, पूर्ण उम्मीद एवं पूर्ण विश्वास से भरी है। कविता का भविष्य भी स्वर्णिम दिख रहा है। कविता अलंकरण न होकर समाज का आइना बन रही है, जो सत्य का उद्घाटन करने में पूर्ण समर्थ है। शमशेर के शब्दों में – 
“ ओ युग आ मुझे, 
और लिए चल, जरा सा, 
और गा, कुछ ऐसे गा- 
कि मैं सुनूँ और झूँमू।” 
इस प्रकार आज का साहित्य मनुष्य की चिंता को लेकर संघर्षशील है। मानवमूल्य और उसका निर्धारण सदी की सबसे बड़ी चुनौती है। 
संदर्भग्रंथ- 
हिंदी कविता का वैयक्तिक परिपेक्ष्य ,रामकमल राय, लोकभारती प्रकाशन ,इलाहबाद, 2010 
भाषा संवेदना और सर्जन ,रामस्वरूप चतुर्वेदी, लोकभारती प्रकाशन, इलाहबाद, 1996 
इक्कीसवी सदी का हिंदी साहित्य ,संपादक रवीन्द्रनाथ मिश्र, 
लोकभारती प्रकाशन ,इलाहबाद 
बीसवीं सदी का हिंदी साहित्य ,सं. विश्वनाथ तिवारी, भारतीय ज्ञानपीठ ,दिल्ली 




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