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नवीन माथुर पंचोली की ग़ज़लें

नवीन माथुर पंचोली
पास होकर भी आशकार नहीं।
जिंदगी तुझ सा राज़दार नहीं।

तेरा वुजूद है सब यहाँ लेक़िन,
ख़ास तेरा किसी से प्यार नहीं।

जितनी मर्जी तेरी ,सफ़र तेरा,
तुझपे साँसों का इख़्तियार नहीं।

जिस जगह तू शुमार रहती है,
कोई उस हद के आर-पार नहीं।

वक़्त के साथ ही रज़ा तेरी,
इसलिए तेरा एतबार नहीं।

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चले थे सोचकर उस इम्तिहाँ तक।
न पहुँचे आज तक हम आसमाँ तक।

पता हम पूछकर निकले थे लेक़िन,
हुए गुमराह ही उनके मकाँ तक।

कि थोड़ी देर सुस्ताने के बदले,
उठाया फासला फिर कारवाँ तक।

वो दिल के हाल से गुजरा हुआ था,
जो रिश्ता था किसी के दरमियाँ तक।

निगाहें दूर तक पहुँची तो लेक़िन,
वहाँ भी था वही जो था यहाँ तक।

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जागते ,सोते साथ रहता है।
शख़्स जोआस-पास रहता है।

साथ चलता है वो परछाई सा,
पास इतना तमाम रहता है ।

इस तरह बस गया है यादों में,
जिसका हर पल ख़्याल रहता है।

छोड़कर दूर जा नहीं सकते,
हमसे उसका करार रहता है।

अपने पूछे हुए सवालों का,
पास उसके जवाब रहता है।

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क्या ख़बर थी कि हाँ कर के मुकर जाएगा।
वो हवाओं की तरह छुप के गुज़र जाएगा।

फूल की तरहाँ रहेगा अगर जहाँ में वो,
हाथ लगते ही यहाँ पल में बिखर जाएगा।

ये शरारत है सभी उसकी की गई लेकिन,
इसका इल्ज़ाम किसी और के सर जाएगा।

रास आ जायेगी जब फिर से हर खुशी उसको,
तब से दिल उसका सभी ग़म से उभर जाएगा।

जितनी यादों को बसा रखा है उसने दिल में,
उनका चेहरा उसकी आँखों मे उतर जाएगा।

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