म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

शरद जोशी स्मृति में ‘व्यंजना की सीमा लांघते व्यंग्य’ विषय पर राष्ट्रीय विमर्श आयोजित

शरद जोशी स्मृति में ‘व्यंजना की सीमा लांघते व्यंग्य’ विषय पर राष्ट्रीय विमर्श आयोजित
व्यंग्यकारों के लिए आत्मावलोकन का समय है: डॉ. विकास दवे
आज व्यंग्य को विचारधारा के साथ गढ़ा जा रहा है: बी.एल. आच्छा
उज्जैन। व्यंग्य आज व्यंजना की सीमाएं लांघ रहा है और इस विधा का दुरुपयोग भी बढ़ रहा है। व्यंग्यकारों के लिए यह आत्मावलोकन का समय है। उन्हें अपनी रचनाओं को व्यंग्य की कसौटियों पर स्वयं कसना होगा। व्यंग्य का मूल उद्देश्य चोट करना है, लेकिन वर्तमान में इस विधा का क्षरण हो रहा है। इसके कारणों पर विचार करना आवश्यक है। यह बात मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद और साहित्य अकादमी द्वारा प्रख्यात व्यंग्यकार शरद जोशी की स्मृति में आयोजित ‘व्यंजना की सीमा लांघते व्यंग्य : विधा के क्षरण का मुख्य कारक’ विषयक विमर्श में साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे ने कही। 


अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रख्यात समालोचक बी.एल. आच्छा ने कहा कि शरद जोशी के व्यंग्यों में जितना साहस सत्ता का सच कहने का था, उतना ही विपक्ष का सच कहने का भी था। उनके व्यंग्यों में आक्रामकता के प्रभावशाली तेवर के साथ भाषा का संयम और वैचारिक प्रतिरोध मौजूद था। आज व्यंग्य को विचारधारा के साथ गढ़ा जा रहा है। अभिव्यक्ति की भाषा में गिरावट आई है और मूल्यों के नाम पर व्यक्तिवादी प्रवृत्तियां हावी हो रही हैं। समाज की विसंगतियों के ताले खोलना व्यंग्यकार का दायित्व है। व्यंग्य समाज और लोक की रक्षा का माध्यम है।

बीज वक्तव्य देते हुए प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. पिलकेंद्र अरोरा ने कहा कि व्यंग्य व्यंजना की सीमा का अतिक्रमण तब करता है, जब रचनाकार पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर सायास लेखन करता है। वर्तमान समय में व्यंग्य की बढ़ती लोकप्रियता ही कहीं न कहीं इस विधा के क्षरण का कारण बन रही है। प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी ने कहा कि शरद जोशी की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण उनके व्यंग्यों में मौजूद विरोध का स्वर था, जो आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ा हुआ था। उन्होंने व्यंग्य विधा को विशिष्ट पहचान दिलाने का काम किया। विमर्श में वरिष्ठ व्यंग्यकार शांतिलाल जैन, शशांक दुबे, डॉ. हरीशकुमार सिंह, डॉ. स्वामीनाथ पांडे, राजेन्द्र नागर, डॉ. पांखुरी वक्त और डॉ. गिरीश पंड्या ने सहभागिता करते हुए व्यंग्य रचनाओं का रोचक पाठ किया।


अतिथियों ने मां वाग्देवी के समक्ष दीप प्रज्ज्वलित कर विमर्श का शुभारंभ किया। मालवी में सरस्वती वंदना डॉ. राजेश रावल सुशील ने प्रस्तुत की। अतिथियों का स्वागत श्रीपाद जोशी, राकेश सिंह, मीरा जैन और मोहन सिंह हिंगोले आदि ने किया। आयोजन में सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलानुशासक डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा, डॉ. जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ. श्रीकृष्ण जोशी, वरिष्ठ कवि अशोक भाटी, डॉ. चिंतामणि राठौर, प्रवीण गार्गव, डॉ. माया बदेका, डॉ. पंकजा सोनवलकर, संगीता तल्लेरा, डॉ. अभिलाषा शर्मा, सुरेन्द्र सर्किट, राहुल शर्मा, डॉ. विजय टेलर, उद्योगपति ईश्वर पटेल, जगदीश शर्मा, सीमा देवेन्द्र, आशा गंगा शिरडोनकर, रश्मि भुराडिया, नियति माथुर, जी.के. निगम, मानसिंह शरद, आर.पी. तिवारी, डॉ. रफीक नागोरी, संदीप सृजन, डॉ. विजय सुखवानी, दिलीप जैन, अरविन्द जोशी, सुंदरलाल मालवीय, अजय मेहता, सुभाष पाठक, अनिल कुरेल, शैलेश लेले, अमित माथुर, सेजमल कछ्वाय और पूजा भावसार सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार एवं हिन्दी अध्ययनशाला के शोधार्थी उपस्थित रहे। संचालन डॉ. संदीप नाडकर्णी ने किया तथा आभार स्थानीय संयोजक मुकेश जोशी ने माना।

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