जीवन प्रकाश आर्य की कृति ‘भाव शब्दिका’ का लोकार्पण
रचनाकार असंख्य लोगों की पीड़ा को साहित्य के रूप में सामने लाता है : डॉ. विकास दवे
जीवन के उल्लास ही नहीं, मानवीय संघर्ष और पीड़ा के कवि भी हैं जीवन प्रकाश आर्य : प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा
उज्जैन। प्रेमचंद सृजन पीठ, उज्जैन द्वारा जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान में वरिष्ठ कवि जीवन प्रकाश आर्य के काव्य संग्रह ‘भाव शब्दिका’ का लोकार्पण एवं राष्ट्रीय समीक्षा संगोष्ठी आयोजित की गई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल के निदेशक डॉ. विकास दवे थे। अध्यक्षता पूर्व कुलपति प्रो. बालकृष्ण शर्मा ने की। मुख्य वक्ता सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा थे। वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शिव चौरसिया, पूर्व राजभाषा अधिकारी डॉ. हीरालाल कर्नावट (अहमदाबाद), वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. जया मिश्रा तथा प्रख्यात आलोचक बी.एल. आच्छा (चेन्नई) ने कृति पर विचार व्यक्त किए।
मुख्य अतिथि डॉ. विकास दवे ने कहा कि सृष्टि के पहले छंद भंग को भोगते हुए जीवन प्रकाश आर्य छंद को जोड़ने और सुंदर रचनाएं करने का कार्य कर रहे हैं। मनुष्य जब दुखों की नदियां पार करता है, तब ऐसी बहुमूल्य रचनाएं सामने आती हैं। संसार में असंख्य मनुष्य समान पीड़ा से गुजरते हैं और रचनाकार उनकी पीड़ा को साहित्य के रूप में अभिव्यक्त करता है। कवि जीवन प्रकाश आर्य इस दायित्व का बखूबी निर्वहन कर रहे हैं। अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. बालकृष्ण शर्मा ने कहा कि जीवन प्रकाश आर्य की कविताएं हृदय की गहराइयों तक पहुंचती हैं। वे नए बिंबों के साथ अपनी कविताओं में नए शब्द भी गढ़ते हैं।
कृति की समीक्षा करते हुए प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि ‘भाव शब्दिका’ कवि के पचास वर्षों के संघर्ष, अनुभवों और संवेदनाओं का निचोड़ है। जीवन प्रकाश आर्य केवल जीवन के उल्लास के ही नहीं, बल्कि मानवीय संघर्ष और पीड़ा के भी कवि हैं। आर्य समाज से जुड़े होने के कारण उनकी कविताओं में वेदों, उपनिषदों और पौराणिक संदर्भों का गहरा प्रभाव दिखाई देता है। कवि ने समाज के पतन, राजनीतिक अव्यवस्था और आम आदमी की व्यथा को भी प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया है। उनकी यह कृति पिछली डेढ़ शताब्दी के भारतीय समाज का संवेदनात्मक और वैचारिक इतिहास प्रस्तुत करती है।
डॉ. शिव चौरसिया ने कहा कि जीवन प्रकाश आर्य की कविताओं में मानवीय संवेदना और दर्द की गहरी अनुभूति है। ये कविताएं भारतीय काव्य परंपरा की निरंतरता को आगे बढ़ाती हैं। डॉ. हीरालाल कर्नावट, बी.एल. आच्छा और डॉ. जया मिश्रा ने भी काव्य संग्रह पर विचार व्यक्त करते हुए इसकी सराहना की।
प्रारंभ में प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी ने स्वागत भाषण दिया। अमित माथुर ने बीज वक्तव्य प्रस्तुत किया। अतिथियों ने मां सरस्वती के चित्र पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर जीवन प्रकाश आर्य की कविताओं की सांगीतिक प्रस्तुति पं. शैलेंद्र भट्ट, बालकृष्ण गौतम, दिनेश परिहार, ललित नागर, प्रदीप चतुर्वेदी और हंसा चतुर्वेदी ने दी।
अतिथि स्वागत जीवन प्रकाश आर्य, मुकेश जोशी, सीमा देवेंद्र, नियति माथुर, कुशाग्र माथुर और वेदांश कुलश्रेष्ठ सहित साहित्यकारों एवं परिजनों ने किया। आयोजन में डॉ. पिलकेंद्र अरोरा, डॉ. हरीशकुमार सिंह, शशांक दुबे, राजेंद्र व्यास, अशोक भाटी, डॉ. क्षमा सिसोदिया, शांतिलाल जैन, संदीप सृजन, डॉ. राजेश रावल, डॉ. विक्रम विवेक, डॉ. स्वामिनाथ पांडे, डॉ. संदीप नाडकर्णी, डॉ. माया बदेका, सीमा देवेंद्र, संगीता तल्लेरा, श्वेतिमा निगम और डॉ. गीतांजलि मिश्रा सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार उपस्थित रहे। संचालन दुर्गाशंकर सूर्यवंशी एवं रश्मि भुराड़िया ने किया। आभार किशोर चंदन ने व्यक्त किया।


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