दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में शारदीय काव्य संध्या संपन्न
भोपाल। दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में शारदीय काव्य संध्या का आयोजन किया गया। वरिष्ठ कवि लक्ष्मीकांत जवने ने जब अपनी पंक्तियां- 'गुलाबी सी ठंडक हवा में घुल गई यारों, मोहब्बत की नई खिड़की अचानक खुल गई यारों' प्रस्तुत कीं तो सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में कवि एवं रंगकर्मी हेमंत देवलेकर तथा अध्यक्ष के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार मोहन सगोरिया उपस्थित थे। कार्यक्रम के पूर्व संग्रहालय की निदेशक करुणा राजुरकर ने अतिथियों एवं कवियों का पुष्प और पुस्तक भेंटकर स्वागत किया।
काव्य संध्या में घनश्याम मैथिल अमृत ने पढ़ा- 'शरद पूर्णिमा आ गई ले अमृत घट ले द्वार, अंतर से स्वागत करें दोनों बांह पसार।' कवि कमल सिंह कमल ने अपनी पंक्तियों- 'समझौता मत कीजिए स्वाभिमान के साथ, विष के लड्डू से भले खाली दोनों हाथ' से स्वाभिमान का संदेश दिया। शरद यायावर ने 'चाहे अंबर के दर्द बरसे' पंक्तियां प्रस्तुत कीं। रूपाली सक्सेना की पंक्तियां- 'आसान नहीं है औरतों का गीत गजल कविता लिखना' खूब सराही गईं। युवा कवि नमन चौकसे ने कहा- 'उत्सव सिर्फ कुछ तारीख नहीं होते।' चंद्रभान सिंह पवार ने पढ़ा- 'तुम्हारी आंख से आंसू सुखा पाऊं तो सुख पाऊं।' वहीं रोहित कुमार मधु ने अपनी पंक्तियों- 'जब होश एक हुस्न ने सबके उड़ा दिए, हमने भी जलते अपने दिखा दिए' से श्रोताओं की दाद बटोरी।
काव्य गोष्ठी में कुमार अखिलेश, अनिल कुमार साकेत, नीति राज चौरे, मनन दीक्षित, रोहित कुमार, शांतनु सिंह, अमित कुमार गांगल, दिनेश मकरंद, नितेश नैश, कृष्णा श्रीवास, रमेश भूमरकर, बीके श्रीवास्तव, हेमंत देवलेकर एवं मोहन सागोरिया ने भी अपनी कविताओं का वाचन किया। कार्यक्रम का संचालन घनश्याम मैथिल अमृत ने किया। अंत में संग्रहालय के अध्यक्ष रामराव वामनकर ने उपस्थितजनों के प्रति आभार व्यक्त किया।


0 टिप्पणियाँ