श्रेष्ठ व्यंग्य वही है, जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाए- डॉ. प्रेम जनमेजय
डॉ. हरीशकुमार सिंह की व्यंग्य कृति ‘बड़े अच्छे लगते हैं चुनाव’ का लोकार्पण
उज्जैन। व्यंग्य सामाजिक विसंगतियों और व्यवस्था के पाखंड को उजागर करने का सशक्त माध्यम है। सामाजिक परिस्थितियों पर मौन रहना व्यंग्यकार के लिए संभव नहीं है। व्यंग्य विवशताजन्य हथियार है, जो समाज में सकारात्मक बदलाव का मार्ग प्रशस्त करता है। यह विचार वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय ने प्रेमचंद सृजन पीठ, मध्यप्रदेश लेखक संघ तथा सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला के संयुक्त तत्वावधान में कालिदास अकादमी में आयोजित राष्ट्रीय परिसंवाद एवं व्यंग्य विमर्श में व्यक्त किए। इस अवसर पर डॉ. हरीशकुमार सिंह की व्यंग्य कृति ‘बड़े अच्छे लगते हैं चुनाव’ का लोकार्पण भी किया गया।
मुख्य अतिथि डॉ. जनमेजय ने कहा कि डॉ. हरीशकुमार सिंह ने वर्तमान राजनीति की विसंगतियों पर साहसपूर्वक प्रहार किया है। लोकतंत्र के आदर्शों के बीच सत्ता की लोलुपता और षड्यंत्रों को उन्होंने व्यंग्य के माध्यम से उजागर किया है। व्यंग्य का आकाश निरंतर विस्तृत हो रहा है और श्रेष्ठ व्यंग्य वही है, जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाए।
विशिष्ट अतिथि समालोचक एवं कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि डॉ. हरीशकुमार सिंह की व्यंग्य रचनाओं में पूर्ववर्ती समृद्ध व्यंग्य परंपरा का विस्तार दिखाई देता है। उनकी रचनाओं में धन की लालसा, लोकतंत्र की विसंगतियों और एकाधिकार पर गहरी चोट की गई है। व्यंग्य अब केवल कॉलम तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक और शाश्वत साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित हो चुका है। उन्होंने कहा कि ऋग्वेद, उपनिषद, बौद्ध साहित्य, मत्तविलास प्रहसन और कबीर की वाणी में भी व्यंग्य के तत्व मिलते हैं। व्यंग्य समय-समय पर समाज को आईना दिखाता रहा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सत्यनारायण जटिया ने कहा कि साहित्य की विधाओं में व्यंग्य अत्यंत लोकप्रिय है। व्यंग्य करने और उसमें पारंगत होने के लिए गहरे अनुभव की आवश्यकता होती है।
अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. शिव चौरसिया ने कहा कि उज्जैन में पंडित सूर्यनारायण व्यास, शरद जोशी और डॉ. शिव शर्मा ने व्यंग्य की समृद्ध परंपरा विकसित की है। डॉ. हरीशकुमार सिंह इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। डॉ. पिलकेंद्र अरोरा ने कहा कि मूल्यों का पाताल जितना विस्तृत होगा, व्यंग्य का आकाश भी उतना ही विस्तृत होगा। व्यंग्य गिरते मूल्यों के प्रति चिंता व्यक्त करने के साथ मनुष्य और समाज को बेहतर बनाने का प्रयास करता है।
पुस्तक पर चर्चा करते हुए शशांक दुबे ने कहा कि डॉ. सिंह की व्यंग्य रचनाओं में सजग पत्रकार की पैनी दृष्टि दिखाई देती है। वे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक घटनाओं के साथ खेल एवं सिनेमा से जुड़ी गतिविधियों पर भी बारीकी से नजर रखते हैं। उनके व्यंग्य विद्रूपताओं पर विनम्र आक्रोश व्यक्त करते हैं तथा आम आदमी के सुख-दुख, हर्ष-अवसाद और आशा-आशंका को संवेदनात्मक धरातल पर प्रस्तुत करते हैं।
स्वागत भाषण में प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी ने वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय के योगदान को रेखांकित करते हुए उन्हें व्यंग्य का विश्वविद्यालय बताया। अतिथियों ने डॉ. हरीशकुमार सिंह की व्यंग्य कृति ‘बड़े अच्छे लगते हैं चुनाव’ का लोकार्पण किया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन से हुआ। डॉ. राजेश रावल ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। अतिथि स्वागत डॉ. ब्रजेशकुमार सिंह, राजेश तोमर, डॉ. उमेशकुमार सिंह, सुभाष पाठक, शैलेश लेले, संतोष सुपेकर, संदीप सृजन, राजेन्द्र नागर, श्रीराम दवे, प्रदीप सरल, डॉ. सीमा मकवाना, पूजा परमार और सुनील जैन सहित अन्य साहित्यकारों ने किया। आयोजन में डॉ. प्रतिभा शर्मा, डॉ. उर्मि शर्मा, डॉ. श्रीकृष्ण जोशी, शरद शर्मा, डॉ. अभिलाषा शर्मा, स्वामी मुस्कुराके, डॉ. विजय सुखवानी, चंदर सोनाने, सीमा देवेन्द्र, डॉ. माया बदेका, डॉ. पांखुरी वक्त जोशी, डॉ. प्रीति जोशी, संगीता तल्लेरा, डॉ. पंकजा सोनवलकर, योगेश यादव, डॉ. रमेश चांगेसिया प्रभात, सोनाली विजयवर्गीय, आशा गंगा शिरढोणकर, डॉ. डीएस नागरिया, प्रफुल्ल शुक्ल, मानसिंह शरद, रवि गुप्ता, जीवन प्रकाश आर्य, सुगनचन्द जैन, उद्धव जोशी, डॉ. स्वामीनाथ पांडे, शांतिलाल जैन, डॉ. तपस्या ठाकुर, सुरेंद्र सर्किट, सुरेश चौबे, आर.सी. शर्मा, हरिहर शर्मा, श्वेतिमा निगम, विनोद काबरा, अजय सूर्यवंशी और सेजमल कछवाह सहित हिंदी अध्ययनशाला के शोधार्थी एवं बड़ी संख्या में साहित्यकार उपस्थित रहे। संचालन डॉ. हरीशकुमार सिंह ने किया तथा आभार डॉ. जगदीश चन्द्र शर्मा ने माना।




0 टिप्पणियाँ