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भारत की लोकसंस्कृति, साहित्य और जनजातीय परंपराओं का योगदान अविस्मरणीय : प्रो. शर्मा

भारत की लोकसंस्कृति, साहित्य और जनजातीय परंपराओं का योगदान अविस्मरणीय : प्रो. शर्मा
उज्जैन। भारत की लोकसंस्कृति, लोक साहित्य और जनजातीय परंपराएं देश की सांस्कृतिक पहचान की आधारशिला हैं। इनके संरक्षण से ही भारतीय समाज अपनी जड़ों और परंपराओं से जुड़ा रह सकता है। यह विचार सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला और अखिल भारतीय साहित्य परिषद न्यास, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘प्राक् लोक मंथन 2026’ में विश्वविद्यालय के कुलानुशासक एवं संस्कृतिविद् प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा ने मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किए। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अखिल भारतीय कार्यकारिणी के डॉ. देवदास साकेत, रीवा थे तथा अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शिव चौरसिया ने की। इस अवसर पर लोक संस्कृति के विविध आयामों, लोकबोलियों, लोकगीतों, परंपराओं और लुप्त होते लोकाचारों के संरक्षण पर विचार-विमर्श हुआ।

प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि भारत की आत्मा उसके लोक साहित्य, लोक कलाओं और जनजातीय संस्कृति में बसती है। लोक संस्कृति हमें ‘मैं’ से ‘हम’ की व्यापक चेतना की ओर ले जाती है। वेद, शास्त्र और लोक एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, बल्कि भारतीय संस्कारों और परंपराओं में इनका समन्वय दिखाई देता है। भारतीय लोक संस्कृति प्रकृति को पूजनीय मानते हुए उसके साथ संतुलन बनाकर रहने का संदेश देती है। उन्होंने चिंता जताई कि आधुनिकता के दबाव में समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों से दूर होता जा रहा है। लोक कलाकारों, वादकों और मौखिक इतिहास के संवाहकों का सम्मान करते हुए लोक विरासत के संरक्षण के लिए उन्होंने ग्यारह सूत्र प्रस्तुत किए। इनमें लोक जागरण, मौखिक इतिहास का दस्तावेजीकरण, शिक्षण-अनुसंधान और डिजिटल माध्यमों का उपयोग प्रमुख हैं। उन्होंने कहा कि इन प्रयासों से नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ा जा सकता है।

डॉ. देवदास साकेत ने कहा कि लोक संस्कृति के संरक्षण के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि लोकजीवन किस प्रकार जीवंत रहेगा और लोकबोलियों का प्रवाह कैसे बना रहेगा। इसके लिए आवश्यक है कि हम एक-दूसरे की भाषाओं और बोलियों को जानें तथा लोक साहित्य के संरक्षण का अभियान जन-जन तक पहुंचाएं। उन्होंने लोक साहित्य की शब्द संपदा के व्यवस्थित संकलन, शब्दानुक्रम, शब्दरचना और शब्दकोश निर्माण पर बल दिया। अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. शिव चौरसिया ने कहा कि जिस देश में लोक सुरक्षित रहता है, वहां शास्त्र भी सुरक्षित रहता है। लोक और शास्त्र एक-दूसरे के पूरक हैं। लोक के जीवंत रहने से धर्म, विश्वबंधुत्व और मानवीय संवेदनाएं भी जीवित रहती हैं। लोक का संबंध धरती और जनजीवन से है, इसलिए लोक को बचाना स्वयं को बचाने के समान है।

विशिष्ट अतिथि एवं ललित कला विभागाध्यक्ष प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा ने कहा कि जिसने लोक के व्याकरण को समझ लिया, उसने वेद के व्याकरण को भी समझ लिया। शास्त्र का लोक तक पहुंचना और लोक का शास्त्र से जुड़ना ही दोनों का वास्तविक समन्वय है। रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य भी लोकजीवन से जुड़कर सभ्यता और संस्कृति को समझने की प्रेरणा देते हैं। आकाशवाणी के वरिष्ठ अधिकारी डॉ. ब्रह्मप्रकाश चतुर्वेदी ने लोक शैलियों, परंपराओं, बोलियों और साहित्य को डिजिटल माध्यमों से संरक्षित करने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि लुप्त हो रहे लोकाचारों का संकलन और दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए, क्योंकि लोक परंपराएं निरंतर समाज को प्रेरित करती हैं।

कार्यक्रम की प्रस्तावना रखते हुए मालवा प्रांत प्रमुख, लोक साहित्य डॉ. प्रवीण जोशी ने कहा कि लोक वह भाव है, जो हम सभी को जोड़ता है। ‘हम भारत के लोग’ की भावना को केंद्र में रखकर लोक साहित्य की अलख को आगे बढ़ाना और नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करना समय की आवश्यकता है। डॉ. राजेश रावल ‘सुशील’ ने कहा कि लोकगीतों को उनकी मूल लोकधुन में ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए, तभी उनकी आत्मा और सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रह सकती है। कार्यक्रम में राजकुमारी सोलंकी एवं समूह, देवास तथा ज्योत्सना गोमे, इंदौर ने सुमधुर लोकगीत प्रस्तुत किए। कमल अंजना ने मालवी कविता का पाठ किया। अतिथियों और कलाकारों का स्मृति चिह्न, मौक्तिक माला, अंगवस्त्र, नारियल और साहित्य भेंट कर सारस्वत सम्मान किया गया।

आयोजन में डॉ. ललित नागर, राजेश शर्मा, वंदना जैन, संध्या पुरोहित, अंकित शर्मा, डॉ. प्रीति जोशी, मुक्तेश त्रिवेदी, सौरभ अवस्थी, डॉ. सुमन जैन, विजिया जैन, मधु गुप्ता, प्रियंका जोशी, राजेश तिवारी, जितेंद्र मालवीय, राजेश ठाकुर, डॉ. लक्ष्मी मेहर, डॉ. रश्मि, डॉ. नेत्रा रावणकर, डॉ. वी.के. सक्सेना, डॉ. अभिलाषा शर्मा, नितिन पॉल, कला गुरु एल.एन. सिंहरोड़िया, डॉ. महिमा मरमट, सपना पंचोली, राजेंद्र गुरु, मिमरोट, पूजा परमार, अजय सूर्यवंशी, दिग्विजय द्विवेदी और राकेश सहित अनेक साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी एवं शोधकर्ता उपस्थित रहे। संचालन डॉ. ललित नागर ने किया तथा आभार संयोजक डॉ. प्रवीण जोशी ने माना।

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