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पाठक को बेचैन करता है व्यंग्य, विचार भी देता है : डॉ. प्रेम जनमेजय

पाठक को बेचैन करता है व्यंग्य, विचार भी देता है : डॉ. प्रेम जनमेजय
राष्ट्रीय परिसंवाद में व्यंग्य के समकालीन परिदृश्य और शोध की संभावनाओं पर मंथन, विद्वानों का सारस्वत सम्मान
उज्जैन। सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला द्वारा प्रेमचंद सृजन पीठ के सहयोग से ‘व्यंग्य का समकालीन परिदृश्य और शोध की संभावनाएँ’ विषय पर राष्ट्रीय परिसंवाद आयोजित किया गया। अध्यक्षता नई दिल्ली के प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. प्रेम जनमेजय ने की। मुख्य अतिथि मुंबई विश्वविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय थे। विश्वविद्यालय के कुलानुशासक एवं समालोचक प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा, प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा, व्यंग्यकार पिलकेन्द्र अरोरा, प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी तथा डॉ. हरीशकुमार सिंह ने व्यंग्य के विविध पक्षों पर विचार व्यक्त किए।

डॉ. प्रेम जनमेजय ने कहा कि व्यंग्य सुशिक्षित मस्तिष्क की विधा है। यह पाठक को बेचैन करने के साथ विचार करने के लिए प्रेरित करता है। व्यंग्य में शब्दों के अभिधार्थ के बजाय अन्यार्थ का महत्त्व होता है। इसकी भाषा तिर्यक और कथ्य बिंबात्मक होता है। हास्य व्यंग्य में उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है। उन्होंने कहा कि परसाई के समय की चुनौतियों और आज की परिस्थितियों में अंतर है। समकालीन व्यंग्य भी संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। व्यंग्य की बिंदी में ही उसका डंक छिपा होता है। साहित्य सृजन के लिए ठहराव जरूरी है, जो आज कम होता जा रहा है।

मुख्य अतिथि प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय ने कहा कि प्रेम जनमेजय का व्यंग्य समकालीन संदर्भों में प्रासंगिक है। उनके संपादन में प्रकाशित ‘व्यंग्य यात्रा’ पत्रिका ने व्यंग्य साहित्य के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाई है। भगवान शिव के परिवार का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि व्यंग्य में परस्पर विरोधी स्थितियों का सामंजस्य किस प्रकार स्थापित किया जाता है। प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि व्यंग्य की धारा अनादि काल से प्रवाहित है। संस्कृत साहित्य से लेकर लोक साहित्य और संस्कृति तक में इसके तत्त्व मौजूद हैं। मालवा के लोकनाट्य माच में भी सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों पर प्रहार करने वाली विदूषक परंपरा दिखाई देती है। उन्होंने व्यंग्य को सशक्त साहित्यिक विधा बताते हुए इसमें शोध की व्यापक संभावनाएँ रेखांकित कीं।

प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा ने व्यंग्य के इतिहास और उससे जुड़े रचनाकारों पर चर्चा करते हुए कहा कि प्रेम जनमेजय के व्यंग्यों में महानगरीय समस्याएँ प्रभावी ढंग से सामने आती हैं। डॉ. हरीशकुमार सिंह ने उनकी व्यंग्य कृति ‘बर्फ का पानी’ के संदर्भ में समकालीन परिस्थितियों को समझने की संभावनाओं पर प्रकाश डाला। पिलकेन्द्र अरोरा और मुकेश जोशी ने भी व्यंग्य के वर्तमान परिदृश्य पर विचार व्यक्त किए।

परिसंवाद में डॉ. प्रेम जनमेजय, प्रो. करुणाशंकर उपाध्याय और प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा का सारस्वत सम्मान किया गया। प्रारंभ में लोक गायक सुंदरलाल मालवीय ने पारंपरिक गीत प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में कला गुरु लक्ष्मीनारायण सिंहरोड़िया, सीमा मकवाना, अरुण प्रजापति, शिवपुरी सहित अनेक साहित्यकार, शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित थे। संचालन पूजा परमार ने किया तथा आभार डॉ. नीलिमा वर्मा ने माना।

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