म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

लघुकथा-दिवस पर वर्चुअल वैश्विक लघुकथा-सम्मेलन आयोजित

लघुकथा-दिवस पर वर्चुअल वैश्विक लघुकथा-सम्मेलन आयोजित
6 महाद्वीपों और 20 देशों के 26 लघुकथाकारों ने की सहभागिता

नारनौल। मनुमुक्त 'मानव' मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा लघुकथा-दिवस के उपलक्ष्य में गत शाम वर्चुअल वैश्विक लघुकथा-सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें छह महाद्वीपों और बीस देशों के छब्बीस लघुकथाकारों ने सहभागिता की। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए नेपाल के पूर्व कृषि मंत्री त्रिलोचन ढकाल (काठमांडू) ने कहा कि आज लघुकथा भारत और नेपाल की सीमाओं को लांँघकर, पूरे विश्व में लिखी और पढ़ी जा रही है। ऐसे आयोजनों से इसकी लोकप्रियता तथा स्वीकार्यता और बढेगी। सूरदास ब्रजभाषा अकादमी, मथुरा (उत्तर प्रदेश) के निदेशक डॉ. केशवदेव शर्मा ने, अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में आधुनिक लघुकथा को प्राचीन काल की बोध, जातक और नीति कथाओं से भिन्न बताते हुए, स्पष्ट किया कि समकालीन लघुकथा जीवन-यथार्थ से जुड़ी है। इससे पूर्व विषय-प्रवर्तन करते हुए चीफ ट्रस्टी डाॅ. रामनिवास 'मानव' ने, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) की 'हंस' पत्रिका के अक्तूबर, 1938 अंक में प्रकाशित नित्यानंद की 'इंद्रधनुष के नीचे' रचना को हिंदी की प्रथम लघुकथा तथा नित्यानंद को प्रथम लघुकथाकार बताते हुए, कहा कि इससे पहले की लघुआकारीय कथात्मक रचनाएँ लघुकथा का पूर्वरूप तो कही जा सकती हैं, लेकिन लघुकथाएँ नहीं।

उद्योग विस्तार अधिकारी डाॅ. सुनील भारद्वाज द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना-गीत के उपरांत डॉ. पंकज गौड़ के कुशल संचालन तथा डॉ. कांता भारती के प्रेरक सानिध्य में संपन्न हुई इस संगोष्ठी में सिडनी (आस्ट्रेलिया) की डॉ. भावना कुँवर ने 'बोझ' और प्रगीत कुँवर ने 'अपना-अपना जस्टीफिकेशन', ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) के रोहितकुमार 'हैप्पी' ने 'दोराहा', टोक्यो (जापान) की डॉ. रमा पूर्णिमा शर्मा ने 'अनसुनी आवाज', सिंगापुर सिटी (सिंगापुर) की चित्रा गुप्ता ने 'शिंगल्स', नेपाल से काठमांडू के डाॅ. पुष्करराज भट्ट ने 'गुणवत्ता' और भैरहवा के डॉ. कपिल लामिछाने ने 'भगवान को वरदान', कोलंबो (श्रीलंका) की डाॅ. अजलि मिश्रा ने 'वह', भारत से सिरसा की डाॅ. शील कौशिक ने 'हरे बूटे की तलाश', नारनौल के डाॅ. रामनिवास 'मानव' ने 'कारण : मरने-जीने के', डॉ. पंकज गौड़ नै 'गला दबाती सहानुभूति' और डॉ. जितेंद्र भारद्वाज ने 'नौकरी', दुबई सिटी (दुबई) के डाॅ. नितिन उपाध्ये ने 'वेशभूषा', आबूधाबी सिटी (आबूधाबी) की डाॅ. मीरा ठाकुर ने 'कामकाजी', दोहा (कतर) की डाॅ. मानसी शर्मा ने 'आखिर कब तक?', वाक्वा (माॅरिशस) की कल्पना लालजी ने 'निर्णय', अकरा (घाना) की डाॅ. मीनाक्षी सौरभ ने 'डिब्बा', अंकारा (तुर्किये) के ऐमराह करकोच ने 'मिट्टी का आकर्षण', सोफिया (बुल्गारिया) की डाॅ. मोना कौशिक ने 'धप्पा', कोलोन (जर्मनी) की डाॅ. शिप्रा शिल्पी सक्सेना ने 'धुंधलाती यादें', आसन (नीदरलैंड) की ऋतु नन्नन पांडे ने 'डर', स्टाॅकहोम (स्वीडन) के सुरेश पांडे ने 'आधारशिला', लंदन (ब्रिटेन) के कृष्ण बजगाई ने 'सरप्राइज', पोर्ट ऑफ स्पेन (ट्रिनिडाड) की आशा मोर ने 'एक आसान विकल्प' और टोरंटो (कनाडा) की डाॅ. शैलजा सक्सेना ने 'भूख' शीर्षक लघुकथा का पाठ किया। तत्पश्चात् जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा (बिहार) में हिंदी-विभाग की पूर्व अध्यक्ष डॉ. अनीता राकेश ने, पठित लघुकथाओं पर विस्तृत समीक्षात्मक टिप्पणी प्रस्तुत करते हुए, समकालीन हिंदी-लघुकथा के स्वरूप और महत्त्व को रेखांकित किया।

दो घंटों तक चले इस ऐतिहासिक लघुकथा-सम्मेलन में देश-विदेश के साहित्यकारों के साथ-साथ अनेक गणमान्य नागरिकों की उपस्थिति भी उल्लेखनीय रही।

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