म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

जो बात हम अपनी मातृभाषा अपनी बोली में व्यक्त कर सकते हैं वह दूसरी भाषा में नहीं - घनश्याम मैथिल

जो बात हम अपनी मातृभाषा अपनी बोली में व्यक्त कर सकते हैं वह दूसरी भाषा में नहीं - घनश्याम मैथिल
भोपाल। 'बोलियों से हमारा ज्ञान और संस्कृति सुरक्षित है बोलियां ही भाषाओं का मूल आधार हैं जब बोलियां सुरक्षित होंगी तो भाषा समृद्ध होगी हम अपने मूल से कटकर नहीं रह सकते, आज बोलियों पर ही नहीं हमारी भाषाओं पर भी संकट है यदि आज से ही प्रयास नहीं किए गए तो इन्हें विलुप्त होने से कोई नहीं बचा सकता' यह उद्गार हैं वरिष्ठ पत्रकार और चिंतक श्री प्रमोद भार्गव ग्वालियर के जो लघुकथा शोध केंद्र समिति भोपाल द्वारा आयोजित राजभाषा पखवाड़े के अंतर्गत 'निज भाषा उन्नति अहै' कार्यक्रम के सोलहवें सत्र में 'विलुप्त होती बोलियां समस्याएं और समाधान ' विषय मुख्य अतिथि वक्ता के रूप में बोल रहे थे। कार्यक्रम में दूसरे वक्ता राज बोहरे वरिष्ठ साहित्यकार दतिया ने 'हिंदी भाषा की समृद्धि में लोक साहित्य की भूमिका' पर बोलते हुए उन्होंने कहा -'लोक साहित्य हमें समृद्ध करता है लोक से हमें मुहावरे कहावतें मिलती हैं लोक ही हमारा मूल है।' इस अवसर पर वक्ता के रूप में बोलते हुए घनश्याम मैथिल अमृत ने कहा कि - 'लोक भाषा मातृभाषा में जो बात कही जा सकती है वह दूसरी भाषा में नहीं अपनी भाषा में मिठास और अपनापन होता है इनसे नई पीढ़ी को जोड़ना हमारा दायित्व है इसके लिए आधुनिक प्रचार माध्यम जैसे फिल्में धारावाहिक और सोशल मीडिया बहुत उपयोगी हो सकते हैं, कार्यक्रम के आरम्भ में कल्याणी झा रांची वरिष्ठ साहित्यकार और कार्यकारणी सदस्य लघुकथा शोध केंद्र ने स्वागत उद्बोधन दिया और डॉ ममता माली मुंबई और चित्रा राणा राघव यूएसए ने कार्यक्रम का सफल संचालन संयोजन किया। आयोजन में देश दुनिया के अनेक राजभाषा प्रेमी उपस्थित थे। 

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