साहित्य की सेवा को समर्पित एक सक्रिय व्यक्तित्व : डॉ. विकास दवे
साहित्य की दुनिया में कुछ लोग केवल लिखते नहीं हैं, बल्कि साहित्य के लिए वातावरण भी तैयार करते हैं। वे स्वयं रचना करते हुए दूसरे रचनाकारों के लिए रास्ते खोलते हैं, साहित्यिक संस्थाओं को सक्रिय करते हैं और नई पीढ़ी को अपनी भाषा और संस्कृति से जोड़ने का काम करते हैं। डॉ. विकास दवे का साहित्यिक व्यक्तित्व इसी व्यापक भूमिका का परिचायक है। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक के रूप में उनकी आगामी दो वर्षों के लिए पुनर्नियुक्ति उनके लंबे साहित्यिक और संस्थागत योगदान की निरंतरता है। पिछले लगभग छह वर्षों में उन्होंने अकादमी की गतिविधियों को गति देने के साथ साहित्य, लोकभाषा और नए रचनाकारों के बीच संवाद का विस्तार किया है।
10 दिसंबर 2020 को मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का दायित्व संभालने के बाद डॉ. दवे के सामने सबसे पहली चुनौती उस समय की थी, जब कोरोना महामारी ने साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को लगभग रोक दिया था। साहित्यकारों का मिलना-जुलना बंद था, सभागारों में सन्नाटा था और साहित्यिक आयोजन स्थगित थे। ऐसे कठिन समय के बाद अकादमी की गतिविधियों को फिर से सक्रिय स्वरूप देना उनके कार्यकाल की शुरुआती चुनौतियों में रहा। परिस्थितियां सामान्य हुईं तो अकादमी में व्याख्यान, रचनापाठ, परिचर्चा, पुस्तक लोकार्पण और सम्मान समारोहों की गतिविधियां लगातार बढ़ीं।
डॉ. दवे की विशेषता यह रही कि उन्होंने साहित्य को केवल पुस्तकों की दुनिया तक सीमित नहीं माना। साहित्य उनके लिए समाज की संवेदना, संस्कृति की स्मृति और मनुष्य के जीवनानुभव से जुड़ा विषय है। यही सोच उनके कार्यों में दिखाई देती है। स्थापित साहित्यकारों के साथ नई पीढ़ी के रचनाकारों को मंच देना, अलग-अलग विधाओं को स्थान देना और प्रदेश के साहित्यिक क्षेत्रों से संवाद कायम रखना उनकी कार्यशैली का महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। मध्यप्रदेश का साहित्यिक वैभव उसकी लोकभाषाओं के बिना अधूरा है। मालवी, निमाड़ी, बुंदेली, बघेली, भीली और गोंडी जैसी भाषिक परंपराएं प्रदेश की मिट्टी से निकली हुई आवाजें हैं। इनमें केवल शब्द नहीं हैं, बल्कि लोकजीवन का इतिहास, संस्कृति, संघर्ष और संवेदना सुरक्षित है। डॉ. विकास दवे ने इन लोकभाषाओं को साहित्यिक गतिविधियों में स्थान देने पर विशेष जोर दिया। 2021 में अकादमी द्वारा निमाड़ी, मालवी, बुंदेली, बघेली बोलियों पर व्याख्यान एवं रचनापाठ आयोजित किए गए। विभिन्न लोकभाषाओं के साहित्य के लिए पृथक पुरस्कारों की परंपरा को आगे बढ़ाना भी इसी दृष्टि का हिस्सा रहा।
लोकभाषा को सम्मान देना वास्तव में उस समाज को सम्मान देना है, जिसने उसे पीढ़ियों तक जीवित रखा। जब मालवी में लिखने वाला रचनाकार मालवी के नाम पर सम्मानित होता है, जब बुंदेली या बघेली की रचना साहित्यिक मंच पर चर्चा का विषय बनती है, तो यह केवल लेखक का सम्मान नहीं होता; उस पूरी भाषिक परंपरा का सम्मान होता है। डॉ. दवे के कार्यकाल में इस दृष्टि को संस्थागत रूप देने के प्रयास दिखाई दिए। उनके साहित्यिक सरोकारों का एक महत्वपूर्ण केंद्र नए रचनाकार भी रहे हैं। किसी भी साहित्यिक संस्था की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसने कितने वरिष्ठ साहित्यकारों को सम्मानित किया, बल्कि यह भी है कि उसने कितने नए लेखकों को अपनी पहली पहचान बनाने का अवसर दिया। पांडुलिपि प्रकाशन सहायता योजना इसी सोच की महत्वपूर्ण कड़ी है। प्रति वर्ष 40 पांडुलिपियों का चयन किया गया। प्रथम कृति के प्रकाशन में सहायता का यह प्रयास उन रचनाकारों के लिए विशेष महत्व रखता है, जिनके पास प्रतिभा और रचना तो है, लेकिन प्रकाशन के साधन सीमित हैं।
एक लेखक की पहली पुस्तक केवल कागज पर छपी सामग्री नहीं होती। वह वर्षों की मेहनत, सपनों और आत्मविश्वास का परिणाम होती है। इसलिए किसी नए रचनाकार की पांडुलिपि को पुस्तक बनने में मदद करना साहित्य की अगली पीढ़ी तैयार करने जैसा काम है। डॉ. दवे के कार्यकाल में इस दिशा में हुए प्रयास उनकी साहित्यिक दृष्टि को रेखांकित करते हैं। पुरस्कारों के क्षेत्र में भी अकादमी की गतिविधियों को व्यापक बनाने का प्रयास हुआ। कविता, गीत, गजल, व्यंग्य, लघुकथा, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत और अनुवाद जैसी विधाओं के साथ पत्रकारिता तथा इंटरनेट और ब्लॉग लेखन जैसी नई अभिव्यक्ति विधाओं को भी स्थान मिला। इससे यह स्पष्ट होता है कि साहित्य को बदलते समय के साथ देखने की आवश्यकता को समझा गया। साहित्य का संसार निरंतर बदल रहा है और नई पीढ़ी नए माध्यमों से लिख और पढ़ रही है। ऐसे में साहित्यिक संस्था का इन माध्यमों से संवाद आवश्यक है।
डॉ. विकास दवे का अपना साहित्यिक जीवन भी बहुआयामी रहा है। लेखन, संपादन, बाल साहित्य, पत्रकारिता, शोध और व्याख्यान—इन सभी क्षेत्रों से उनका लंबा जुड़ाव रहा है। बाल साहित्य के क्षेत्र में उनका काम विशेष रूप से उल्लेखित होता रहा है। ‘देवपुत्र’ जैसी बाल पत्रिका के संपादन से उनका जुड़ाव साहित्य को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। साहित्य उनके लिए केवल गंभीर विमर्श का विषय नहीं, बल्कि संस्कार और सामाजिक चेतना का माध्यम भी रहा है। यही कारण है कि उनके व्यक्तित्व में साहित्य और समाज के बीच संवाद की चिंता दिखाई देती है। साहित्यकारों के बीच बैठना, उनकी रचनाएं सुनना, नई प्रतिभाओं को पहचानना और साहित्यिक गतिविधियों को लगातार आगे बढ़ाना उनकी सक्रियता का हिस्सा रहा है। मध्यप्रदेश जैसे विशाल राज्य में यह काम आसान नहीं है, क्योंकि यहां साहित्य की अनेक धाराएं अलग-अलग क्षेत्रों में प्रवाहित होती हैं।
डॉ. दवे के कार्यकाल की एक महत्वपूर्ण विशेषता अकादमी की गतिविधियों का प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों तक पहुंचना भी रही है। साहित्य केवल भोपाल या इंदौर में नहीं बसता। उज्जैन से लेकर रीवा, सतना से लेकर ग्वालियर और सागर से लेकर छोटे कस्बों तक साहित्यकार अपनी-अपनी जमीन पर सक्रिय हैं। इन साहित्यिक केंद्रों से संवाद बढ़ाना अकादमी को वास्तव में पूरे प्रदेश की संस्था बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उनकी पुनर्नियुक्ति के अवसर पर उनके व्यक्तित्व का मूल्यांकन केवल पद पर रहने की अवधि से नहीं किया जाना चाहिए। उनके साहित्यिक जीवन की व्यापकता और संस्थागत सक्रियता दोनों को साथ रखकर देखना होगा। एक ओर वे स्वयं लेखन और साहित्यिक गतिविधियों से जुड़े रहे, दूसरी ओर उन्होंने अकादमी के माध्यम से दूसरे रचनाकारों के लिए मंच तैयार करने का प्रयास किया। यही किसी साहित्यसेवी व्यक्तित्व की बड़ी पहचान होती है। सम्मान केवल पद मिलने से नहीं मिलता। वास्तविक सम्मान उस विश्वास से बनता है जो साहित्यकार किसी व्यक्ति के काम के प्रति रखते हैं। डॉ. विकास दवे की पुनर्नियुक्ति उनके लिए व्यक्तिगत उपलब्धि के साथ मध्यप्रदेश के साहित्यिक जगत के लिए भी निरंतरता का अवसर है। जिनमें वे लोकभाषाओं, नए रचनाकारों, युवा पाठकों और साहित्य की बदलती दुनिया के बीच अकादमी की भूमिका को और मजबूत करेंगे, यह तय है।
साहित्य की सेवा लंबी साधना मांगती है। इसमें तात्कालिक उपलब्धियों से अधिक महत्व उस वातावरण का होता है जो वर्षों में बनता है। यदि किसी साहित्यिक संस्था के दरवाजे नए रचनाकारों के लिए खुले हों, लोकभाषाओं की आवाज सुनी जाती हो, वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान हो और साहित्य लगातार समाज के बीच पहुंचता रहे, तो संस्था जीवंत बनी रहती है। डॉ. विकास दवे का साहित्यिक सफर इसी सक्रियता की कहानी है। उनकी पुनर्नियुक्ति पर उन्हें शुभकामनाएं देते हुए यही कहा जा सकता है कि साहित्य के प्रति उनकी ऊर्जा, अध्ययन और संस्थागत अनुभव आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश की साहित्यिक चेतना को और समृद्ध करें। उनकी सबसे बड़ी पहचान केवल यह नहीं कि वे साहित्य अकादमी के निदेशक हैं, बल्कि यह है कि उन्होंने अपने दायित्व को साहित्यकारों और साहित्य की सेवा से जोड़ने का प्रयास किया है। यही प्रयास किसी भी साहित्यिक व्यक्तित्व को पद से ऊपर उठाकर साहित्य-सेवी व्यक्तित्व बनाता है।
संदीप सृजन
संपादक - शब्द प्रवाह



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