प्रेमचंद सृजन पीठ द्वारा ‘हिंदी भाषा, राजभाषा से राष्ट्रभाषा’ विषय पर विमर्श और काव्य गोष्ठी आयोजित
उज्जैन। हम आज हिंदी को राजभाषा या राष्ट्रभाषा कहलाने में लगे हैं, जबकि हिंदी आज विश्व भाषा का रूप ले चुकी है। दुनिया भर में हिंदी बोलने वाले मिल जाएंगे। गिरमिटियाओं ने हिंदी को विश्व फलक तक पहुंचाया है। 132 देशों में हिंदी पढ़ी-पढ़ाई जा रही है। सतत संवाद से ही भाषा प्रचलन में रहती है। यह विचार चेन्नई से पधारे वरिष्ठ साहित्यकार प्रो. बी.एल. आच्छा ने प्रेमचंद सृजन पीठ एवं सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला के तत्वावधान में हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में वाग्देवी भवन में आयोजित ‘हिंदी भाषा, राजभाषा से राष्ट्रभाषा’ विषयक विमर्श में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए व्यक्त किए।
प्रमुख अतिथि आचार्य डॉ. जगदीश शर्मा ने कहा कि तमाम अवरोधों के बाद भी हिंदी जन-जन की भाषा बनी हुई है और राजभाषा, राष्ट्रभाषा का सफर तय करते हुए विश्व भाषा बन गई है। हिंदी को सम्मान देकर और अपनाकर ही अपने आत्मसम्मान में वृद्धि की जा सकती है। मुख्य अतिथि एवं आईडीबीआई के पूर्व महाप्रबंधक (राजभाषा) शशांक दुबे ने कहा कि हमें अपने घरों में ही नौनिहालों में हिंदी भाषा के संस्कार का बीजारोपण करना चाहिए, जिससे अपनी मातृभाषा में पल-बढ़कर उच्च शिक्षा में भी वे हिंदी अपना सकें। उन्होंने कहा कि आप किसी भी भाषा में पढ़ाई करें, बातचीत हिंदी में ही करनी पड़ेगी। अंग्रेजी में कितनी ही पढ़ाई कर लें, व्यावहारिक रूप से हिंदी ही काम आएगी।
सारस्वत अतिथि आचार्य प्रो. हरिमोहन बुधौलिया ने कहा कि हिंदी देश में ही नहीं, विदेशों के विश्वविद्यालयों में भी पढ़ाई जा रही है, जो हिंदी की व्यापक स्वीकार्यता का प्रमाण है। विशेष अतिथि प्रख्यात कवि दिनेश दिग्गज ने कहा कि हमारी भाषा और वेशभूषा पर निरंतर आक्रमण कर हमारी संस्कृति पर हमले किए गए, लेकिन मातृभाषा हिंदी को हमने नहीं छोड़ा और आज हिंदी ही देश की संपर्क भाषा है। विशिष्ट अतिथि प्रख्यात साहित्यकार एवं कवि अशोक भाटी ने कहा कि शब्द और कविता ही जनजागरण का कार्य करते आए हैं और हिंदी भारत माता की बिंदी है, जिसका हम सबको मान रखना है। उन्होंने बताया कि भगवान शंकर के डमरू से ओंकार का नाद हुआ, इससे संस्कृत निकली, फिर शब्द बने और भाषा बनी।
इस अवसर पर आयोजित काव्य गोष्ठी में प्रख्यात कवियों ने अपनी कविताओं से खूब तालियां बटोरीं। काव्य पाठ करने वालों में सुगनचंद जैन, प्रफुल्ल शुक्ल, संतोष सुपेकर, दिलीप जैन, विक्रम विवेक, सुरेंद्र सर्किट, कुमार सम्भव और अनामिका सोनी शामिल रहे। आरंभ में अतिथियों ने माता सरस्वती और प्रेमचंद के चित्र पर माल्यार्पण कर आयोजन का शुभारंभ किया। सरस्वती वंदना संगीता तल्लेरा ने प्रस्तुत की। अतिथि स्वागत प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी, पूजा परमार, सेजमल कछवाय, सुरेंद्र सर्किट आदि ने किया। संचालन डॉ. हरीशकुमार सिंह ने किया तथा आभार मुकेश जोशी ने व्यक्त किया।


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