हिंदी हमारी चेतना और चिन्तन को पोसती है - डॉ. मिथिलेश अवस्थी
हिंदी अपनी भाषाओं एवं बोलियों को दैनिक व्यवहार में लाना हमारी नैतिक जिम्मेवारी - लक्ष्मीशंकर वाजपेयी
भोपाल। ‘हिंदी हमारी चेतना और चिन्तन को पोसती है। यह राजभाषा पखवाड़े का आयोजन एक उत्सव की तरह होता है, जिससे प्राप्त जागृति और आनंद हमें नई ऊष्मा और ऊर्जा से भर देता है। बाजार और सिनेमा को हिंदी ने समृद्ध किया है, मगर अफसोस कि हिंदी वाले स्वयं हिंदी को व्यवहार में लाने में शर्माते हैं।’ यह उद्गार हैं डॉ. मिथिलेश अवस्थी, वरिष्ठ साहित्यकार, नागपुर के, जो लघुकथा शोध केंद्र समिति, भोपाल द्वारा आयोजित ‘निज भाषा उन्नति अहै’ के अंतर्गत राजभाषा पखवाड़े के सत्रहवें एवं समापन अवसर पर ‘सांस्कृतिक उत्सव से भाषा विकास तक’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।
इस आयोजन के दूसरे वक्ता डॉ. लक्ष्मीशंकर वाजपेयी, वरिष्ठ साहित्यकार ने इस अवसर पर ‘हिंदी का वैश्विक संदर्भ’ विषय पर बोलते हुए कहा - ‘हिंदी को हम अधिक से अधिक अपने व्यवहार में लाएं, अपने जीवन का हिस्सा बनाएं। हमारी प्रादेशिक भाषाएं और बोलियां हिंदी को समृद्ध करती हैं। देश से अंग्रेज चले गए, पर अंग्रेजी रह गई, यह बहुत बड़ी सामाजिक, सांस्कृतिक और भाषिक आपदा है।' कार्यक्रम में स्वागत उद्बोधन केंद्र के महासचिव घनश्याम मैथिल अमृत ने प्रस्तुत किया और सफल संचालन डॉ. ममता माली, मुंबई एवं चित्रा राघव राणा, यूएसए ने किया। कार्यक्रम में श्रीमती कांता रॉय, निदेशक, लघुकथा शोध केंद्र समिति ने अपनी बात रखते हुए इस आयोजन की आवश्यकता, उपयोगिता, रूपरेखा पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम में मंच पर उपस्थित श्रोताओं ने सक्रिय भागीदारी करते हुए अपने विचार रखे। कार्यक्रम के अंत में केंद्र की ओर से डॉ. गिरिजेश सक्सेना ने आभार व्यक्त किया।


0 टिप्पणियाँ