उज़्बेकिस्तान में नई पीढ़ी निरंतर हिंदी के अध्ययन और शोध से जुड़ रही है - डॉ.मनीष कुमार मिश्रा
भोपाल। 'उज़्बेकिस्तान में नई पीढ़ी निरंतर हिंदी के अध्ययन और शोध से जुड़ रही है, मध्य एशिया में हिंदी अपने व्यापार और सिनेमा के कारण समृद्ध हुई, हिंदी भाषा ही ने नहीं बल्कि हमारी संस्कृति ने भी भाषा के साथ सुदूर देशों की यात्रा की है, उज़्बेकिस्तान के अनेक विद्यालयों में हिंदी एक अनिवार्य विषय के रूप में पढ़ाई जा रही है, हिंदी का भविष्य यहां बड़ा उज्जवल है।' यह उदगार हैं वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.मनीष कुमार मिश्रा एसोसिएट प्रोफेसर के.एम .अग्रवाल महाविद्यालय कल्याण महाराष्ट्र के जो लघुकथा कथा शोध केंद्र समिति भोपाल द्वारा आयोजित राजभाषा पखवाड़े के दशम दिवस पर आयोजित ऑन लाइन गूगल गोष्ठी में निज भाषा उन्नति के अंतर्गत आयोजन में "उज़्बेकिस्तान में हिंदी का बढ़ता प्रभाव" विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।
कार्यक्रम के आरम्भ में घनश्याम मैथिल अमृत महासचिव लघुकथा शोध केंद्र समिति भोपाल ने उपस्थित जनों का स्वागत उद्बोधन दिया, इसके पश्चात संचालक द्वय डॉ.ममता माली एवं चित्रा राघव राणा के सरस एवं कुशल संचालन में कार्यकम आरम्भ हुआ।
कार्यक्रम के दूसरे वक्ता डॉ.राकेश पाण्डेय वरिष्ठ साहित्यकार एवं संपादक - प्रवासी संसार (पत्रिका) ने 'हिंदी भाषा के विकास में प्रवासी साहित्यकारों का योगदान' विषय पर बोलते हुए कहा कि - 'प्रवासी हिंदी भाषियों की हिंदी में हमारी प्रादेशिक भाषाओं और लोक बोलियों का प्रभाव है, गिरमिटिया मजदूर हिंदी के प्रथम राजदूत, यहां की हिंदी मानक हिंदी नहीं यहां तमाम प्रादेशिक भाषाओं और लोक बोलियों से बनी हिंदी उपयोग की जाती है। '
कार्यक्रम में उपस्थित श्रोताओं ने अपने जिज्ञासा भरे प्रश्न भी वक्ताओं से किए, कार्यक्रम के अंत में कांता रॉय निदेशक लघुकथा शोध केंद्र समिति ने भी अपने महत्वपूर्ण विचार व्यक्त किए, कार्यक्रम के अंत में शेफालिका श्रीवास्तव ने सभी उपस्थितजनों का आभार प्रकट किया।


0 टिप्पणियाँ