म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

संस्कृति भाषा के बिना जीवित नहीं रह सकती : विनोद कुमार जैन

संस्कृति भाषा के बिना जीवित नहीं रह सकती : विनोद कुमार जैन

भोपाल। संस्कृति भाषा के साथ जीवित रहती है। यदि भाषा पर संकट आया तो संस्कृति, संस्कार और पहचान पर भी संकट आएगा। भाषा के मामले में उदारीकरण का यह अर्थ नहीं कि हम भाषाई संतुलन ही भूल जाएं और अपनी भाषा के सहज, सरल और आम शब्दों की जगह अंग्रेजी भाषा के शब्दों का प्रयोग करने लगें। यह उद्गार वरिष्ठ साहित्यकार विनोद कुमार जैन ने लघुकथा शोध केंद्र समिति, भोपाल द्वारा आयोजित राजभाषा पखवाड़े के सातवें दिन ‘हिंदी में विदेशी भाषाओं के शब्द जरूरी या मजबूरी’ विषय पर मुख्य अतिथि वक्ता के रूप में व्यक्त किए।

कार्यक्रम के पूर्व केंद्र की ओर से वरिष्ठ साहित्यकार कर्नल डॉ. गिरजेश सक्सेना ने स्वागत उद्बोधन दिया। दूसरे वक्ता डॉ. प्रबोध गोविल ने ‘हिंग्लिश के बढ़ते प्रभाव में हिंदी का भविष्य’ विषय पर बोलते हुए कहा कि भाषा में शुद्धता जैसी कोई चीज नहीं होती। हिंदी में रोज नए शब्द आते हैं, हमें उदारता से अन्य भाषाओं के शब्द स्वीकार करना चाहिए। समय के साथ बदलाव आते हैं। कार्यक्रम का सफल संचालन चित्रा राघव राणा एवं डॉ. ममता माली ने किया। अंत में लघुकथा शोध केंद्र समिति की निदेशक कांता राय ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया। आयोजन में देशभर के राजभाषा हिंदी प्रेमी लेखक एवं पाठक उपस्थित थे।

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