म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

पद्मभूषण डॉ शिवमंगलसिंह सुमन जयंती पर हुआ राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

पद्मभूषण डॉ शिवमंगलसिंह सुमन जयंती पर हुआ राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
उज्जैन। सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला एवं प्रेमचंद सृजन पीठ के संयुक्त तत्वावधान में नागपंचमी पर पद्मभूषण डॉ शिवमंगलसिंह सुमन के जयंती अवसर पर सुमन जी की काव्य चेतना के विविध आयामों पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि एवं सम्पादक श्रीराम दवे थे। अध्यक्षता कुलानुशासक एवं विभागाध्यक्ष प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने की। आयोजन में प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक श्री मुकेश जोशी, साहित्यकार डॉ हरीशकुमार सिंह, डॉ शशांक दुबे, मप्र लोक सेवा आयोग की पूर्व परीक्षा नियंत्रक डॉ उर्मि शर्मा, डॉ सीएल शर्मा, रतलाम, श्री अशोक भाटी, प्रो जगदीश चंद्र शर्मा आदि ने विचार व्यक्त किए। प्रारम्भ में उपस्थित जनों ने कविवर डॉ सुमन जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की। साहित्य और सम्पादन के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान के लिए वरिष्ठ कवि श्रीराम दवे को शॉल, साहित्य, अंगवस्त्र एवं पुष्पमाल अर्पित कर उन्हें डॉ शिवमंगलसिंह सुमन सारस्वत सम्मान से अलंकृत किया गया।

वरिष्ठ कवि श्रीराम दवे ने मुख्य अतिथि के रूप में अपने उद्बोधन में कहा कि सुमन जी गति और प्रगति के कवि थे। सुमन जी के काव्य में ओज और आवेग की सशक्त अभिव्यक्ति मिलती है। वे सुनने और बुनने, दोनों के कवि थे। श्री दवे ने सुमन जी के साथ की गई विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों की स्मृतियां साझा कीं।

अध्यक्षता करते हुए कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि सुमन जी की कविताएँ मानवीय गरिमा, स्वाभिमान की प्रतिष्ठा के साथ जड़ता के विरुद्ध प्रतिरोध की कविता है। वे हार मानने के बजाय निरंतर आगे बढ़ने और संघर्ष करने का आह्वान करते हैं। उनकी विद्रोही चेतना कोरी भावुकता या निराशा की उपज नहीं, बल्कि वह सामाजिक यथार्थ, मानवीय स्वाभिमान और परिवर्तन की जीती-जागती अभिव्यक्ति है।

साहित्यकार डॉ हरीश कुमार सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि सुमन जी बड़ी शख्सियत थे और वे प्रेम और सौंदर्य के मुकुटमणि थे। उन्होंने कहा कि यदि हमें सरलता और उदारता सीखनी है तो वह सुमन जी से सीखनी चाहिए। व्यंग्यकार डॉ. शशांक दुबे ने अपने वक्तव्य में सुमन जी से जुड़े संस्मरण सुनाए। उन्होंने कहा कि सुमन जी संयम और तप की मूर्ति थे। सुमन जी में प्रशासनिक गुण बहुत अच्छे थे।

शुरुआत में डॉ. मुकेश जोशी ने स्वागत भाषण देते हुए सभी उपस्थितजनों को शुभकामनाएं प्रेषित की और सुमन जी के जीवन से जुड़े रोचक प्रसंग सुनाकर श्रोताओं को उनके जीवन और व्यक्तित्व से परिचित कराया। डॉ. सी. एल. शर्मा ने कहा कि सुमन जी एक क्रांतिकारी कवि थे, जिन्होंने अपनी कविता के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का संदेश दिया। सुमन जी की कविता में न्याय का निर्देश, सत्य का संदेश और कर्तव्य का आदेश मिलता है। उन्होंने नई पीढ़ी से आह्वान किया कि उन्हें अपने वरिष्ठजनों से प्रेरणा लेनी चाहिए। डॉ. उर्मि शर्मा ने भी इस अवसर पर अपने विचार व्यक्त किए।

आयोजन में सुमन जी द्वारा रचित गीतों की भावपूर्ण सांगीतिक प्रस्तुति ने श्रोताओं को रससिक्त किया, जिसमें सुंदरलाल मालवीय ने यह दिन बार-बार आए, संगीतकार श्री अजय मेहता और पं शैलेन्द्र भट्ट ने विश्वास बढ़ता ही गया, तूफानों की ओर घुमा दो नाविक निज पतवार तथा मैं शिप्रा सा तरल सरल बहता हूं आदि गीत शामिल थे। प्रारंभ में सरस्वती वंदना श्रीमती सीमा देवेंद्र जोशी ने प्रस्तुत की। सरस काव्य पाठ ख्यात कवि अशोक भाटी, मालवी कवि राजेश रावल और संगीता तल्लेरा ने किया। संचालन शोधार्थी पूजा परमार ने किया। आभार प्रदर्शन डॉ. सी. एल. शर्मा रतलाम ने किया।

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