म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

नाग-पूजा का कारण भय नहीं, कृतज्ञता है -डॉ.मुरलीधर चाँदनीवाला

नाग-पूजा का कारण भय नहीं, कृतज्ञता है

लोक-जीवन में नाग को लेकर रहस्य हमेशा से बना हुआ है। कई लोककथाएँ प्रचलित हैं, कई आध्यात्मिक और तांत्रिक विमर्श हैं नाग को लेकर। कई बार मनुष्य की सुप्त चेतना की बात आई, जिसकी जागृति को कुंडलिनी जागरण से जोड़कर देखा जाता है। योग परम्परा कहती है कि मनुष्य के मूलाधार में यह सुप्त चेतना सर्प की तरह कुंडली मार कर बैठी हुई है। ऋग्वेद के 'सार्पराज्ञी सूक्त' में इस सुप्त चेतना को जगाने वाले मंत्र भी मिलते हैं। तंत्र साधना में सर्पविद्या सबसे गूढ मानी जाती है, जो केवल उच्च शक्ति वाले तांत्रिकों के ही बस की बात है।

शिव के गले में पड़ी सर्पों की माला भस्मराग के बीच वह उभरती जीवन-शक्ति है, जो मनुष्य-लोक को रचती है। जब हम शेषनाग के फैले हुए फन को देवों के ऊपर छत्र- छाया के रूप में देखते हैं, तब नाग की महिमा भी विदित होती है। भगवान् कृष्ण के जन्म के ठीक बाद जब नंद बाबा उन्हें टोकरी में लेटा कर आधी रात को यमुना पार करा रहे थे, तब शेषनाग ने ही अपना फन फैलाकर भगवान् की रक्षा की।

नाग जाति एक निष्पक्ष विचार रखने वाली नागयोनि के रूप में ज्यादा प्रसिद्ध है। शायद इसीलिये देवासुर संग्राम में जब समुद्र मंथन हुआ, तब नागराज वासुकि की ही सहायता ली गई। पुराणों में पृथ्वी को शेषनाग की फणि पर टिका हुआ बताया गया, और वेद कहते हैं- 'सत्येनोत्तमिता भूमिः' भूमि सत्य पर टिकी हुई है। इन दोनों बातों को मिलाकर देखें, तो शेषनाग सत्य का ही जीवन्त रूप है। प्रलयकाल में भी केवल वह सत्य ही शेष रहता है। जो शेष है, वही अनंत है। जो अनंत है, वही सर्वत्र व्याप्त है। जिन तीन चरणों में तीनों लोकों को विष्णु ने नाप लिया, वे तीनों लोक मिलकर विष्णु की अनंत शैया बन जाते हैं।

जैविक दृष्टि से तो नाग रेंगने वाला मूक प्राणी है, लेकिन वह रेंगता हुआ मालूम नहीं पड़ता। उसकी स्फूर्ति में प्रबल आवेग होता है। कृषिप्रधान देश भारत में नाग को कभी भी विध्वंसक नहीं, कृषि की रक्षा करने वाला ही माना गया। उसे क्षेत्रपाल कहा गया, उर्वरा भूमि के लिये प्राण-स्वरूप कहा गया। आदिवासी समुदाय कभी नाग जाति की हिंसा नहीं करता। उनका मानना है कि नाग जाति हमारी शक्ति है, यह नष्ट करने के लिये नहीं।

नाग-दम्पति 'रति के उत्कर्ष' की प्रतीक है। 'प्रेम में समर्पण' का कलाबोध कराने वाला खूबसूरत शिल्प खोजना हो, तो वह नाग-नागिन के मिथुन में मिलेगा। अवंतिका के महाकालेश्वर मंदिर की तीसरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर का मंदिर है। यह मंदिर ग्यारहवीं सदी में राजा भोज ने बनवाया था। यह मंदिर साल में केवल एक बार नागपंचमी के दिन खुलता है। यहाँ नागचंद्रेश्वर की जो प्रतिमा है, वह चित्ताकर्षक होने के साथ कई मिथकों से जुड़ी है। महाकाल के ऊपर नाग-नागिन के मिथुन का होना यह बताता है कि वह शिव-पार्वती के एकांत और निर्बाध संवाद का द्योतक है। लोग लम्बी लाइन में लग कर वहाँ अविभक्त समर्पण का सौन्दर्य देखने के लिये जाते हैं।

कला और संस्कृति में नाग-नागिन के जोड़े को 'प्रसन्न दाम्पत्य' के मांगलिक चिह्न के रूप में देखा गया है। हमारी संस्कृति में नाग-नागिन के जोड़े को देखना ही शुभ माना गया। आदिवासी-कला में भीत पर गोबर लीप कर गेरू और खड़ी से जो मांडने बनाये जाते हैं, उनमें नाग-नागिन के जोड़े के साथ उनकी सन्तति को भी बहुत श्रद्धापूर्वक सजाया जाता है। कला का यह अनुष्ठान बहुत सावधानीपूर्वक पवित्र मन से सम्पन्न किया जाता है।

नागपंचमी सावन में आती है। वर्षा से पूरी तरह भींग चुकी पृथ्वी जब उर्वरा होकर उत्सव में मगन होती है, तब नाग-नागिन भी परस्पर आलिंगनबद्ध होकर उत्सव मनाते हैं। यह उत्सव इस धरती पर जीवन का उत्सव है। आदिवासी दम्पतियाँ इस उत्सव का मर्म बहुत गहराई से जानती हैं। उनके लिये यह जीवन जल और मिट्टी की सुगंध से उपजा हुआ है। वे सावन में आसव पीते हैं, झूम-झूम कर नाचते हैं।

आदिवासियों में नाग पुरखों के वे प्रतिनिधि हैं, जो बार-बार ध्यान खींचते रहते हैं। गाँवों में आज भी पुरखों के पवित्र स्मारक के रूप में शिला पर उत्कीर्ण नागदेवता पूजे जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि अरण्यों में बसे मूल आदिवासी नागवंश के थे। इसीलिये आदिवासी कभी किसी नाग के विनाश का विचार भी मन में नहीं लाते। गोगादेव और तेजाजी की कथाएँ बताती हैं कि कैसे नागों ने उनकी परीक्षा ली, और कैसे उन्होंने नाग जाति की रक्षा का वचन निभाया। नागों के प्रति श्रद्धा का यही भाव आदिवासियों से चलकर हमारी धार्मिक संस्कृति में आया, जिसका एक रूप नागपंचमी का उत्सव भी है। आदिवासियों की बात मानें तो नाग की पूजा किसी भय के कारण नहीं, अपितु कृतज्ञतावश की जाती है।

लोकधर्म यह नहीं कि नाग को दूध पिलाया जाये, अपितु यह है कि उन्हें उनके वंश के साथ जीने दिया जाये। वे मनुष्यता को पसंद करते हैं, लेकिन मनुष्यहीनता उनके कोप का भी कारण बन सकती है। नागों के प्रति कृतज्ञता का भाव बना रहे, इतना ही प्रकृति हमसे चाहती है।
डॉ.मुरलीधर चाँदनीवाला

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