कीर्ति शेष--
पद्मश्री कैलाशचंद्र पंत दादा- हिंदी भाषा की रक्षा और समृद्धि का जीवंत उदाहरण
जब कोई महान व्यक्तित्व इस संसार से विदा होता है, तब केवल एक जीवन का अंत नहीं होता, बल्कि एक युग की स्मृतियाँ, एक विचारधारा की जीवंत परंपरा और एक सांस्कृतिक चेतना का विराट अध्याय इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाता है। पद्मश्री कैलाश चंद्र पंत का निधन हिंदी साहित्य, पत्रकारिता, भाषा आंदोलन और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के लिए ऐसा ही क्षण है। उनके जाने से हिंदी जगत ने केवल एक साहित्यकार नहीं खोया, बल्कि ऐसा मार्गदर्शक खो दिया, जिसने अपना संपूर्ण जीवन हिंदी भाषा को राष्ट्र की आत्मा और समाज की संवेदना के रूप में प्रतिष्ठित करने में समर्पित कर दिया।
मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के पूर्व संचालक, अंतरराष्ट्रीय स्तर के हिंदी सेवी, वरिष्ठ साहित्यकार, पत्रकार और शिक्षाविद् के रूप में उन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदी भाषा, साहित्य, पत्रकारिता और सांस्कृतिक चेतना की सेवा में समर्पित कर दिया। लगभग नौ दशक का उनका जीवन तपस्या, समर्पण और निर्भीक पत्रकारिता का प्रतीक रहा।
26 अप्रैल 1936 को मध्य प्रदेश के इंदौर जिले के महू में जन्में पंतजी का पैतृक गाँव उत्तराखंड के बागेश्वर जिले का खंतोली है। माता श्रीमती हरिप्रिया पंत और पिता स्वर्गीय लीलाधर पंत के संस्कारों ने उनके व्यक्तित्व को गढ़ा। प्राथमिक शिक्षा महू में पूरी करने के बाद उन्होंने इंदौर क्रिश्चियन कॉलेज से एम.ए. (हिंदी), साहित्याचार्य और साहित्य रत्न की उपाधियाँ प्राप्त कीं। छात्र जीवन में ही वे स्काउटिंग, वाद-विवाद और सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे। कॉलेज पत्रिका का संपादन और हिंदी समिति का नेतृत्व उनके प्रारंभिक नेतृत्व गुणों का परिचय था।
युवावस्था में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े। मात्र 13 वर्ष की आयु में 14 जनवरी 1949 को मकर संक्रांति के दिन संघ के सत्याग्रह में गिरफ्तार हुए। यह घटना उनके जीवन में देशभक्ति और निर्भीकता का बीज बो गई। व्याख्याता की सरकारी नौकरी के बावजूद हिंदी और साहित्य के प्रति उनका लगाव गहरा था। अंततः उन्होंने नौकरी छोड़कर स्वतंत्र पत्रकारिता और हिंदी सेवा का मार्ग चुना। यह निर्णय उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ था।
पत्रकारिता में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। वे सोशलिस्ट कांग्रेसमैन (दिल्ली), नव प्रभात और नव भारत (भोपाल) से जुड़े। 1963-64 में मासिक ‘शिक्षा प्रदीप’ का प्रकाशन शुरू किया। 1977 में साप्ताहिक ‘जनधर्म’ का प्रकाशन आरंभ किया, जिसे उन्होंने 22 वर्षों तक निरंतर निकाला। ‘जनधर्म’ सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विमर्श का सशक्त मंच बना। मालवा विशेषांक, छत्तीसगढ़ विशेषांक, बुंदेलखंड विशेषांक, तंत्र-मंत्र विशेषांक और आदि गुरु शंकराचार्य विशेषांक जैसे अंक प्रकाशित किए। बाद में इंदौर से ‘दुर्गामी आवाज’ और 2003 से भोपाल से द्वैमासिक/मासिक ‘अक्षरा’ का संपादन किया। ‘अक्षरा’ के मुख्य संपादक के रूप में लगभग 18 वर्षों तक उन्होंने साहित्यिक प्रतिभाओं को मंच दिया। उनके लगभग 800 लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए, जो साहित्यिक, सामाजिक और राजनीतिक विषयों पर गहन चिंतन प्रस्तुत करते हैं।
मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से उनका गहरा जुड़ाव रहा। नवंबर 1988 से सचिव और बाद में महामंत्री/संचालक के रूप में उन्होंने समिति को नया जीवन दिया। हिंदी भवन को विकसित किया, फरवरी 2026 में स्वास्थ्य कारणों से महामंत्री पद से सेवानिवृत्त हुए, लेकिन हिंदी सेवा का उनका सिलसिला नहीं थमा।
उनके साहित्यिक कृतित्व में ‘कौन किसका आदमी’, ‘धुंध के आर-पार’, ‘शब्द का विचार-पथ’, ‘संस्कार, संस्कृति और समाज’, ‘संकल्प की प्रतीक्षा में’, ‘सांस्कृतिक विखंडन-चुनौती और चेतना’, ‘सत्ता, साहित्य और समाज’ तथा ‘शैलेश मटियानी: सृजन यात्रा’ (संपादन) जैसी कृतियाँ शामिल हैं। उनकी लेखन शैली आलोचनात्मक, वैचारिक और समाजोपयोगी रही। वे मुख्य रूप से आलोचनात्मक निबंध लिखते थे। ‘मालवांचल में कूर्मांचल’ नामक अभिनंदन ग्रंथ भी उनके जीवन से जुड़ा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनका योगदान रहा। नौवें विश्व हिंदी सम्मेलन (जोहान्सबर्ग) में विश्व हिंदी सम्मान प्राप्त किया। भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में फिलीपींस, नेपाल, इजराइल आदि देशों की यात्राएँ कीं। ह्यूस्टन में अंतरराष्ट्रीय रामायण सम्मेलन में भागीदारी की। हिंदी को वैश्विक मंच पर मजबूती देने के उनके प्रयास सराहनीय हैं।
उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता थी सादगी, निर्भीकता और निरंतरता। वे ‘दादा’ के नाम से जाने जाते थे। युवा रचनाकारों को प्रोत्साहित करना, संस्थानों का निर्माण करना और हिंदी को जन-जन तक पहुँचाना उनके जीवन का उद्देश्य था। उन्होंने अंग्रेजी पत्रकारिता का अनुभव भी लिया, लेकिन हिंदी के प्रति प्रेम ने उन्हें हिंदी सेवा की ओर मोड़ दिया। वे कहते थे कि भारतीय लोग हिंदी में हस्ताक्षर करें—यह उनका वर्षों पुराना सपना था। 1995 में भोपाल में नागरिक अभिनंदन हुआ। विभिन्न सम्मानों में नेहरू साक्षरता पुरस्कार (पूर्व राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के हाथों), साहित्य भूषण, सुब्रह्मण्य भारती सम्मान, शरद जोशी सम्मान, गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता सम्मान, बृजलाल द्विवेदी सम्मान, निराला साहित्य सम्मान, संस्कृति गौरव सम्मान और हिंदी सेवी सम्मान शामिल हैं। 2026 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। उन्होंने इस सम्मान को सभी हिंदी प्रेमियों को समर्पित करते हुए कहा कि यह सभी हिंदी भाषियों का सम्मान है।
कैलाश चंद्र पंत दादा का जीवन हिंदी भाषा की रक्षा और समृद्धि का जीवंत उदाहरण है। उन्होंने सरकारी सुविधाओं का त्याग कर स्वतंत्र पथ चुना। संस्थानों का निर्माण कर हिंदी को मजबूत किया। पत्रकारिता के माध्यम से समाज में जागरूकता फैलाई। साहित्य के माध्यम से वैचारिक दृष्टि दी। शिक्षा के क्षेत्र में योगदान देकर नई पीढ़ी को संस्कारित किया। उनका व्यक्तित्व लोकसंग्रही था—वे सबको जोड़ने वाले थे। सादगी भरी जीवनशैली, गहन अध्ययन और निरंतर कर्म उनके गुण थे।
आज 31 जुलाई को वे महाप्रयाण यात्रा के लिए प्रस्थान कर चुके है, उनके जाने से मध्य प्रदेश ही नहीं पूरे हिंदी जगत में शून्य उत्पन्न हो गया है। हिंदी भवन, अक्षरा पत्रिका, जनधर्म की परंपरा और राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के कार्य उनके स्मारक बनकर रहेंगे। युवा साहित्यकार, पत्रकार और हिंदी सेवी उनके जीवन से सीख लें कि भाषा सेवा में समर्पण ही सच्ची सफलता है। पद्मश्री सम्मान उनके जीवन की साधना का राष्ट्रीय स्वीकृति था, लेकिन सच्चा सम्मान उनके कार्यों में निहित है। हिंदी जगत उनके ऋण से कभी उऋण नहीं हो सकता। विनम्र श्रद्धांजलि...।
संदीप सृजन
संपादक- शब्द प्रवाह



0 टिप्पणियाँ