डॉ. संतोष श्रीवास्तव की कथाकृति इक्कीसवाँ मिनिट पर विमर्श और काव्य पाठ
भोपाल । मध्य प्रदेश लेखक संघ के अध्यक्ष राजेंद्र गट्टानी की अध्यक्षता, वनमाली कथा के सुप्रसिद्ध संपादक मुकेश वर्मा के मुख्य आतिथ्य और मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशिका डॉक्टर नुसरत मेहदी के सारस्वत आतिथ्य में देश की वरिष्ठ कथाकार संतोष श्रीवास्तव की कथा कृति 'इक्कीसवाँ मिनिट' की कहानियों पर गहन विमर्श हुआ।
सर्वप्रथम लेखिका संतोष श्रीवास्तव ने कृति संरचना, भूमिका और रचना प्रक्रिया के अनुभव साझा करते हुए कहा कि इस दसवें कहानी संग्रह की कहानियों को लिखते हुए मैंने हर चरित्र को जिया है, उनसे संवाद किया है, उनकी प्रसन्नता से प्रसन्न हुई हूँ, उनके आँसुओं को अपनी आँखों में उमड़ते पाया है। मेरी कहानियों ने स्त्री अस्मिता को पुनः परिभाषित करने की कोशिश में अपने स्त्री पात्रों को हारने नहीं दिया है। इसी तारतम्य में जोखिम, मोहभंग, मुक्ति, उड़ान को पँख जैसी कहानियाँ लिखीं गईं।
इस अवसर पर राजेंद्र गट्टानी ने कहा कि इस संग्रह की कहानियाँ रचनाकार की संवेदना से उद्वेलित अंतस से उपजी हैं जो पाठक को भी उद्वेलित करती हैं। मुख्य अतिथि मुकेश वर्मा ने संग्रह की कहानियों समालोचनात्मक समीक्षा भी प्रस्तुत की। इक्कीसवाँ मिनिट को बेहतरीन कहानियों का संग्रह बताया। इनकी कहानियों में विविधता है, जो पाठक को झकझोरती है। मुक्ति कहानी सही दिशा में स्त्री की अस्मिता को पहुँचाती प्रतीत होती है। सारस्वत अतिथि उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ नुसरत मेहदी ने कहा कि इस संग्रह की कहानियों में खुरदुनापन है क्योंकि समाज में व्याप्त खुरदेनेपन को रेखांकित करने हेतु कलम को भी खुरदुरी होना पड़ता है।
डॉ. नीलिमा रंजन ने कृति की सारगर्भित समीक्षा प्रस्तुत की। उन्होंने संतोष श्रीवास्तव का इक्कीसवाँ मिनट अंतस के मर्म से यथार्थ को रोमांचक बनाती सत्रह सार्वभौमिक कहानियों का संग्रह है जिसकी प्रत्येक कहानी में उपन्यास बनने का रहस्य छुपा है। इक्कीसवाँ मिनिट एक फिल्मी फ़िल्म नायक के बीस मिनट असुरक्षित ऊहापुह की कहानी है। नमिता महिमा नविता में फागुन गीतों से समाँ जमाया। श्री प्रतीक द्विवेदी ने सस्वर सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। अतिथियों का स्वागत सुनील चतुर्वेदी ने किया। उसके पश्चात पुस्तक का लोकार्पण किया गया। कार्यक्रम का सरस संचालन जया केतकी शर्मा ने किया।



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