म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

जैन धर्म की मूर्ति पूजा परम्परा के प्राचीन इतिहास 'आयागपट्ट'

जैन धर्म की मूर्ति पूजा परम्परा के प्राचीन इतिहास 'आयागपट्ट' 
मूर्ति पूजा से पहले क्या था? जैन धर्म के प्राचीन 'आयागपट्ट' जिनसे भक्ति का इतिहास समझ आता है। 

आज हम सब मंदिरों में भगवान की सुंदर प्रतिमाओं के दर्शन करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि लगभग 2000–2200 साल पहले (दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व – पहली शताब्दी ईस्वी / 2nd century BCE – 1st century CE), जब भव्य मूर्तिकला अपने शुरुआती चरण में थी, तब हमारे पूर्वज कैसे भक्ति करते थे?

आज देश दर्शन पर हम आपको इतिहास के उस दौर में ले चलेंगे, जहाँ से जैन भक्ति की एक अनोखी परंपरा सामने आती है-प्रतीकों की भक्ति

क्या होते हैं ये 'आयागपट्ट'?

मथुरा के कंकाली टीला की खुदाई में पत्थर के कुछ चौकोर (square) पट्ट मिले हैं, जिन्हें इतिहासकार 'आयागपट्ट' कहते हैं।

ये मुख्यतः दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व (2nd century BCE) से लेकर पहली शताब्दी ईस्वी (1st century CE) के बीच के माने जाते हैं।

ये कोई साधारण पत्थर नहीं थे, बल्कि उस समय के पूजा-अर्पण (votive tablets) थे, जिन्हें श्रद्धालु मंदिरों में समर्पित करते थे।

मूर्ति के साथ-साथ 'चिह्नों' की भक्ति

उस काल में जैन धर्म में प्रतीकों (symbols) का विशेष महत्व था। इन आयागपट्टों पर कई पवित्र चिन्ह बनाए जाते थे, जैसे:

स्वस्तिक: चारों गतियों और आत्मा की यात्रा का प्रतीक
धर्मचक्र: संसार और धर्म के चक्र का संकेत
अष्टमंगल के शुभ चिह्न

खास बात: कई आयागपट्टों में ये चिन्ह प्रमुख होते हैं, जबकि तीर्थंकर की आकृति या तो बहुत छोटी होती है या गौण रूप में दिखाई देती है।

इससे पता चलता है कि उस समय प्रतीक-आधारित भक्ति अत्यंत महत्वपूर्ण थी, जबकि मूर्तिकला भी उसी काल में विकसित हो रही थी।

इतिहास का प्रमाण: मथुरा संग्रहालय

आज भी मथुरा संग्रहालय में इन आयागपट्टों का विशाल संग्रह सुरक्षित है। इन्हें देखकर स्पष्ट होता है कि ईसा पूर्व से लेकर प्रारंभिक ईस्वी काल में जैन कला कैसे प्रतीकों से विकसित होकर भव्य मूर्तियों तक पहुँची।हमारी विरासत सिर्फ मूर्तियों में नहीं, बल्कि इन प्राचीन प्रतीकों और शिलाओं में भी जीवित है।

प्रस्तुति - सरिता सुराणा, हैदराबाद


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