मध्यप्रदेश लेखक संघ की गीत गोष्ठी में पढ़े गये सरस गीत
भोपाल। गीत मानव का आदि सहचर है यह कहना था प्रख्यात नवगीतकार वीरेन्द्र निर्झर का जो मध्यप्रदेश लेखक संघ की प्रादेशिक गीत गोष्ठी की अध्यक्षता करने बुरहानपुर से पधारे थे। आपने कहा कि जीवन का प्रारंभ ही लयात्मकता के साथ होता है और इसी लयात्मकता के कारण गीतों की स्वीकार्यता है। निर्झर ने अपने गीत की पंक्तियांं 'द्विअर्थी चिकनी चुपड़ी बातें ऊपर, मन में भरी खटास, बूझा बहुत मगर अनबूझा रहा सदा आकाश' पढ़ी।
गोष्ठी के सारस्वत अतिथि प्रभु त्रिवेदी (इंदौर) ने कहा कि भारतीय पुरातन छंदों की रसात्मकता हमारी सांस्कृतिक धरोहर है और यह सदैव अक्षुण्ण रहेगी। उन्होंने गीत को परिभाषित करते हुए मुक्तक पढ़ा- गीत है गंगा हृदय की, झर- झराता नीर है। घात खाये आदमी की, कसमसाती पीर है।।कौन बैरी है जगत् में, जो न गाना चाहता, शब्द की हर श्रंखला में, ज्ञान की तस्वीर है।
गोष्ठी के विशिष्ट अतिथि डॉ राम वल्लभ आचार्य ने अपने श्रृंगारिक गीत में कहा - मेरी निर्दोष चदरिया पर, तुमने यह कैसा रंग किया। मैं संयम व्रत ले बैठा था, तुमने मेरा व्रत भंग किया ॥, वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. प्रभा मिश्रा की पंक्तियाँ थीं - स्वप्न में मिल जाए या सच्चाई में, जो मिला वह गीत का आधार है । विद्या वाणी ने पढ़ा - पल-पल जी ले पल पल को तू, मान आखिरी पल को। बस चिंता कर आज अभी की, भूल बन्धु तू कल को।, मुंगावली से आये कवि मनोज दर्द ने अपने गीत में कहा-रोज नये षडयंत्र देश में रचने वाले अपने हैं, मातम की चुभती बेला में हँसने वाले अपने है। खरगोन से पधारीं आरती डोंगरे के गीत की पंक्तियाँ थीं- शरद निशा की रवानगी में, इक़ अकुलाहट बुला रही है। बसंती हो मन मचल रहा है, हर इक दिशा गुनगुना रही है ।
डॉ. प्रतिभा द्विवेदी अपने गीत में कहा- गीत पथ है अति सुगम तुमसे किसने कह दिया, इसपे चल पाये वही गीत को जिसने जिया ।हरदा से पधारे सुभाष सिटोके ने पढ़ा - गीत सजाकर लाया हूँ मैं, गीत सजाकर लाया हूँ, खोटा है या खरा, नारियल ख़ूब बजाकर लाया हूँ ।
गोष्ठी में प्रदेशाध्यक्ष राजेन्द्र गट्टानी, उपाध्यक्ष ऋषि श्रृंगारी, कौशल किशोर चतुर्वेदी ने भी अपने सरस गीतों का पाठ कर श्रोताओं की खूब सराहना बटोरी । स्वागत वक्तव्य उपरांत गोष्ठी का संचालन राजेन्द्र गट्टानी ने तथा अंत में आभार प्रदर्शन कोषाध्यक्ष सुनील चतुर्वेदी ने व्यक किया ।



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