यतीन्द्र नाथ राही का लेखन सुदीर्घ जीवनानुभवों का नवनीत है
सौवें जन्मदिन पर साहित्यिक संस्थाओं ने किया यतीन्द्र नाथ राही का सार्वजनिक अभिनंदन
भोपाल। यतीन्द्र नाथ राही का लेखन सुदीर्घ जीवनानुभवों का नवनीत है। उनकी चेतना और ऊर्जा आज भी उन्हें रचनाधर्म में सक्रिय रखी है। वे सायास नहीं लिखते अपितु उनके भावों का प्रवाह स्वयमेव गीत में ढल जाता है। उक्त बात मूर्धन्य गीतकार यतीन्द्र नाथ राही के सार्वजनिक अभिनन्दन समारोह में अध्यक्ष के रूप में बोलते हुए श्री रघुनन्दन शर्मा ने कही। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि राही जी कि जिजीविषा न थकी है न चुकी है। वे अपने गीतों में केवल स्वयं की बात नहीं करते अपितु समग्र सृष्टि की बात करते हैं।
कार्यक्रम के सारस्वत अतिथि श्री ऋषि कुमार मिश्र ने कहा कि साहित्य का काम असंभव को भी संभव की परिधि में लाता है। इस दृष्टि से राही जी की कलम ज्ञान और शब्द के बीच सेतु का काम करती है। अपने सम्मान की स्वीकृति में वक्तव्य देते हुए राही जी ने यह विश्वास व्यक्त किया की सभी साहित्यकारों का स्नेह उन्हें निरंतर मिलता रहेगा। आपने अपनी लोकार्पित 23 वीं कृति से चुनिंदा गीतों का पाठ किया।
राही जी के व्यक्तित्व पर चर्चा करते हुए डाॅ. साधना गंगराडे ने कहा कि राही जी ने छठवीं कक्षा में पढ़ते आल्हा छंद में कविता लिखी जिसे शाला में सुनाया तो सराहना मिली जिसके बाद यह क्रम चलता रहा और अब तक उन्होंने तेईस कृतियों का सृजन किया है। आपकी लेखनी ने समय को देखा है, समाज को परखा है और मनुष्य को मनुष्य बने रहने की सीख दी है। राही जी की दोहा विधा पर चर्चा करते हुए डाॅ. नुसरत मेंहदी ने कहा कि राही जी का रचना-संसार लोक, स्मृति, संतोष और मूल्य-बोध से समृद्ध है। अपनी पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने आधुनिक भटकन के बीच जीवन और जड़ों की पहचान कराई।
बाल साहित्य पर सुनीता यादव ने कहा कि राही जी को बालमन की गहरी समझ है उन्होंने तितली, बादल, मोर, कबूतर व दादी माँ की गोद में ,जैसी बाल साहित्य कृतियाँ बच्चा बनकर ही लिखी हैं। राही जी की गीत रचनाओं के बारे में श्री ऋषि श्रृंगारी ने कहा कि राही जी अपनी गीत यात्रा में चलते चलते मानसरोवर तक पहुँच गये हैं,जहाँ गीतों के असंख्य शंख व सीपियाँ बिखरे पड़े हैं। डाॅ. राम वल्लभ आचार्य ने नवीन कृति की समीक्षा करते हुए जन सरोकारों का कवि बताया तथा उक्त गीत संकलन की रचनाओं के अंश उद्धृत करते हुए उनके गीतों को आशावादऔर प्रेरणाप्रद निरूपित किया।
भोपाल के साहित्यिक समाज की ओर से अखिल भारतीय साहित्य परिषद भोपाल इकाई, मध्यप्रदेश लेखक संघ , हिन्दी लेखिका संघ मध्यप्रदेश, रामायण केंद्र भोपाल, अखिल भारतीय कला मंदिर , अखिल भारतीय देवनागरी हिन्दी भाषा सम्वर्धन एवम् शोध संस्थान, निर्भया साहित्यिक सामाजिक एवम् महिला कल्याण संस्थान, दुष्यंत कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय, बाल कल्याण एवं बाल साहित्य शोध केंद्र,आरिणी चैरिटेबल फाउंडेशन, छांदस रचनाकार समूह अंतरा, श्रीकृष्ण कृपा मालती महावर बसंत परमार्थ न्यास एवं सकलपर्णा कला एवं साहित्य संस्था द्वारा यह आयोजन दुष्यंत संग्रहालय में किया गया था। कार्यक्रम का प्रारंभ अतिथियों द्वारा सरस्वती की प्रतिमा पर माल्यार्पण एवं दीप प्रज्वलन से किया गया। स्वागत उद्बोधन देते हुए डाॅ. राजेन्द्र गट्टानी ने कहा कि साहित्यकार कभी बूढ़ा नही होता। श्रद्धेय राही जी ने अनवरत सृजनरत रहते हुये इसकी पुष्टि की है। अंत में डाॅ. करुणा राजुरकर ने आभार प्रदर्शन किया।



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