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अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन ही सच्ची राष्ट्र भक्ति - मदन मोहन समर

मध्यप्रदेश लेखक संघ की वीर रस गोष्ठी में कवियों ने पढ़ीं राष्ट्रभक्ति परक कविताएँ


भोपाल।"राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करना ही सच्ची राष्ट्र भक्ति है । यदि हर व्यक्ति स्वयं को विकास की मशीन का एक उपकरण माने तभी देश उन्नति कर सकता है।" यह बात प्रख्यात ओज कवि चौधरी मदन मोहन समर ने मध्यप्रदेश लेखक संघ की प्रादेशिक वीर रस व राष्ट्र भक्ति काव्य गोष्ठी में सारस्वत अतिथि के रूप में उद्बोधन देते हुए कही।

गोष्ठी के मुख्य अतिथि वरिष्ठ ओज कवि पंवार राजस्थानी ने कहा कि साहित्य में वीरगाथा काल से लेकर आधुनिक काल तक राष्ट्र भक्ति परक रचनाओं का सिलसिला मौजूद है । गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए डाॅ. राम वल्लभ आचार्य ने कहा कि शास्त्रों में वीरों के दानवीर, धर्मवीर, कर्मवीर और रणवीर ये चार प्रकार वर्णित हैं और इन्हीं भावों को प्रेरित करने वाली रचनाएँ वीररस की निष्पत्ति करती हैं। गोष्ठी में डाॅ. मनोरमा जैन, प्रह्लाद भक्त, अनिरुद्ध सिंह सेंगर, शंकर राव मोरे, रफ़ीक नागौरी, डाॅ. मोहन तिवारी 'आनंद', चरनजीत सिंह कुकरेजा, सुरेश पटवा, अक्षय बंसल, अनिल शर्मा 'मयंक', धर्मदेव सिंह एवं श्रीमती रूपाली सक्सेना ने अपनी ओजस्वी कविताओं का पाठ किया। प्रारंभ में संघ के प्रादेशिक कोषाध्यक्ष सुनील चतुर्वेदी ने स्वागत वक्तव्य दिया तथा आभार प्रदर्शन किया । संचालन प्रादेशिक मंत्री राजेन्द्र गट्टानी ने किये। 

अंत में दो मिनिट का मौन है। रखकर हाल ही में दिवंगत साहित्यकार नवल तिवारी, डाॅ. परशुराम 'विरही', अशोक वक्त एवं डाॅ. धनंजय वर्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की गयी ।

गोष्ठी में कवियों ने पढ़ा -
पंवार राजस्थानी -
कोख बाँध हो जायेगी यदि बलिदान नहीं होगा ।
कविता मुजरा हो जायेगी यदि स्वाभिमान नहीं होगा ।

मदन मोहन समर -
हम दिव्य नहीं हैं दिनकर से बस छोटी सी चिंगारी हैं ।
हम जहाँ खड़े हैं वहीं राष्ट्र की अस्मत के एक पुजारी हैं ।

डाॅ. राम वल्लभ आचार्य -
फहर फहर फहराए तिरंगा, लहर लहर लहराए ।
इसे थाम कर देश हमारा आगे बढ़ता जाए।

ऋषि श्रंगारी -
याद शहीदों को करके आँखें भर आयी हैं।
जिनके बलिदानों के बल आज़ादी पायी है।

मोहन तिवारी 'आनंद' -
गुनगुना चाहता हूँ गीत उनकी शान के ।
हो गये बलिदान गाते गीत हिन्दुस्तान के ।

अनिरुद्ध सिंह सेंगर -
युद्धों की परिभाषा क्या समझाओगे हमको,
यह भारत है, भारत ने महाभारत देखा है।

प्रह्लाद भक्त -
जीवन में हर वज्र कुसुम सा जानो,
आँसू तो कातरता का चिह्न हुआ करता है।

रफीक नागौरी -
दे दे जो जान अपनी अपने वतन के लिये,
एक पल में उसका चेहरा दमक उठे ।

रूपाली सक्सेना -
आओ मेरे वीरों आओ, आज जलाऐं मिलकर दीप ।
दुखी दिलों को मिलकर सारे, आज सुनाऐ सुंदर गीत ।

शंकर राव मोरे विद्यार्थी -
जय जवान ,जय हिंद कहो, नित वीर जवानों को।
अर्पित निज जीवन भारत हित ,उन बलिदानों को।।

धर्मदेव सिंह -
विविध धर्म भाषा बोली का, उपवन रंग बिरंगा।
देख यहाँ की छटा निराली, हर्षित आज तिरंगा।।

चरनजीत सिंह कुकरेजा -
मेरा वतन मेरा वतन खूबसूरत ये चमन ।
मंत्र वन्दे मातरम्, गणतन्त्र वन्दे मातरम् ।

अक्षय बंसल -
जन जन जपते सुबह- शाम जन गण मन की माला,
हिम शिखरों से सेतुबंध तक जय भारत माता ।

डाॅ.मनोरमा जैन -
जिस माटी पर खून बहा उसका कण कण चंदन है ।
भारत माँ के अमर शहीदों तुमको शत शत वंदन है ।

सुरेश चन्द्र पटवा -
राजनीति ने एक काम नेक कर दिया।
पूरे हिन्दुस्तान को एक कर दिया ।

अनिल शर्मा 'मयंक' -
कारगिल में तुझसे लड़कर
दुश्मन की सेना हारी थी,
कल फिर तू क्यूं हार गया,
क्या दुश्मन की सेना भारी थी।

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