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विवशता (लघुकथा) -प्रिया राय



डॉक्टर - मैंने आपको कितनी बार कहा उसका बचना संभव नहीं है,आप यूँ ही इतने दिन से दौड़े जा रहे भागे जा रहे है।

राहुल- क्या करूं अपनी आंखों के सामने उसे बीमार भी तो नहीं देख सकता।

डॉक्टर- समझने की कोशिश कीजिए उसका अंतिम समय आ गया है, जितने दिन रहेंगा इसी तरह उनको दिन-ब-दिन कष्ट होता रहेगा। आपको आज ही फैसला लेना होगा।

राहुल- कैसा फैसला, डॉक्टर साहब?

डॉक्टर- आप चाहे तो उसे इसी प्रकार कष्ट सहते हुए दो-तीन महीने और रख सकते हैं, हॉस्पिटल की दौड़-भाग और घर में उसका तड़पना आप देख सकते है। और दूसरा है....... आप चाहे तो उसे पीस दे सकते है....... सिर्फ एक इंजेक्शन......।

राहुल के ऊपर एक वज्रपात सा हुआ । सिर्फ एक इंजेक्शन उसको पीस दे सकता है कष्ट से राहत दे सकता है।

वह कुछ सोचने लगा फिर अपने नम आंखों से हॉ डॉक्टर साहब दे दीजिए उसे शांति।

इसी हाथों में उठाकर बोनु को उसी जगह ले गया, जहॉ उसे पहली बार वह मिला था, अपने होटल के पास दरवाजे के निकट, वहीं पहली बार उसे दूसरे कुत्ते के साथ लड़ते हुए दिखा था। बरसात में राहुल के आंसू कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे,उसी जगह उसको दफना दिया अपने दोनों हाथों से।

वह स्मृति आज भी याद आती है,  कैसे एक अनजान कुत्ता उसके पैरों के सामने बैठा रहा उसको सहलाने लगा जैसे एक मां अपने बेटे को प्यार से सहला रही हो।

उसको छोड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था, राहुल अगर बाहर जाता तो वह भी बाहर जाता,राहुल गाड़ी में बैठता तो गाड़ी के पीछे पीछे भागता,अपने साथ उसे घर लेकर जाना ही पड़ा दो साल से वह रह रहा था परिवार का एक सदस्य बनकर।

राहुल को याद आ रहा है जब उसके पिताजी का क्रियाकर्म चल रहा था, उसने खाना पीना छोड़ दिया था, राहुल के बगैर रह नहीं पा रहा था, वह बीमार हो गया था, राहुल को किस प्रकार आधार कार्यक्रम खत्म करके वापस आना पड़ा अपने बोनू के पास।

आज बोनु नहीं रहा उसकी यादें, उसकी खुशबू उसके तन-मन में समाई हुई है उसके आंखों के सामने प्रत्यक्ष रूप से वह दिख रहा है। बेटे की तरह प्यार किया उसी को अपनी आंखों के सामने शांत करा दिया, यह कैसी विवशता है ।

-प्रिया राय,त्रिपुरा

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