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भगवान महावीर का 2550वाँ निर्वाण कल्याणक -डॉ. दिलीप धींग


जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर का निर्वाण ईस्वी पूर्व 527 (विक्रम पूर्व 470) में कार्तिक अमावस्या की अर्द्धरात्रि में साढ़े बहत्तर वर्ष की आयु में पावापुरी में हुआ था। उस समय भगवान महावीर के दो उपवास थे। लगातार दो दिन दो रात (48 घण्टों) से उनकी धर्म-देशना (उपदेश-धारा) प्रवाहित हो रही थी। समवशरण में बिना थके लाखों की परिषद् उनकी देशना का श्रवण कर रही थी। मानवों के अलावा देव-देवियाँ और पशु-पक्षी भी तीर्थंकर महावीर की दिव्य वाणी का अमृतपान कर रहे थे। तीर्थंकर महावीर के अत्यन्त तेजस्वी आभामण्डल और ज्ञानालोक से सम्पूर्ण लोक प्रकाशमान था। उनके निर्वाण के साथ ही एकाएक सर्वत्र अन्धकार छा गया। क्षणभर के लिए देवलोक (स्वर्ग) में भी अंधकार व्याप्त हो गया। करोड़ों आँखों से अश्रुधाराएँ बहने लगीं। देवगण भी अपना रुदन रोक नहीं सके।

ज्ञानज्योति की प्रतिपूर्ति में देवताओं, राजाओं और सभी मानवों ने मणि-रत्नों के दीप जलाकर ज्योति (प्रकाश) की आराधना का संकल्प किया। मल्ल और लिच्छवि गणराज्यों में भी दीप जलाये गये। अमावस की वह निशा पुनः प्रकाशमय हो गई। उसी दिन से भगवान महावीर निर्वाण-कल्याणक के उपलक्ष्य में प्रतिवर्ष दीपावली का पर्व मनाया जाता है। दीपावली मनाने का यह प्राचीनतम ऐतिहासिक प्रमाण है। प्राकृत भाषा के प्राचीन जैन ग्रन्थ कल्पसूत्र इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख है। हेमचन्द्राचार्य रचित त्रिषष्टिशलाका पुरुष चरित्र तथा हरिवंश पुराण में भी इस तथ्य की पुष्टि की गई है। भगवान महावीर की अन्तिम देशना का संकलन प्राकृत भाषा के मूल आगम ग्रंथ उत्तराध्ययन-सूत्र और विपाक-सूत्र में है। दीपावली के अवसर पर उत्तराध्ययन-सूत्र के वाचन और श्रवण की परम्परा है। अगणित श्रद्धालु भगवान महावीर के निर्वाण-कल्याणक के उपलक्ष्य में दीपावली को उपवास, बेला, तेला और विविध जप-तप की साधनाएँ करते हैं।

कार्तिक शुक्लपक्षीय प्रतिपदा को भगवान की पार्थिव देह का अग्नि-संस्कार किया गया। अन्तिम संस्कार के समय नौ मल्लवी और नौ लच्छवी सहित अठारह देशों के राजा, उनकी प्रजा, भगवान महावीर के ज्येष्ठ भ्राता राजा नन्दीवर्द्धन एवं उनके परिवारजन सहित लाखों मनुष्य और देवता उपस्थित थे। देवताओं ने ही प्रभु के अन्तिम संस्कार के लिए गोशीर्ष चन्दन की चिता का निर्माण किया था। अग्निकुमार देवों ने अग्नि प्रज्वलित की और वायुकुमार देवों ने सुगंधित हवाएँ संचारित कीं। अनेक दुर्लभतम सुगन्धित पदार्थों के साथ प्रभु के चरम शरीर की दाह-क्रिया सम्पन्न हुई। तत्पश्चात् मेघकुमार देव ने जलवृष्टि करके चिता शान्त की।

मनुष्य और देवता चिता-स्थल से पवित्र राख और अस्थियाँ ले गये। जब कुछ नहीं बचा तो भक्तगण वहाँ की मिट्टी ही खोद-खोद कर ले जाने लगे। फलस्वरूप भगवान के अग्नि-संस्कार स्थल पर बहुत बड़ा खड्डा हो गया। बाद में वह खड्डा सरोवर में परिवर्तित हो गया। वर्तमान में उसी पावापुरी में स्थित कमल-पुष्पों से आच्छादित जलाशय में जलमन्दिर बना हुआ है। जलमन्दिर सफेद मार्बल से देव-विमान के आकार में निर्मित है। बिहार के नालन्दा जिले में स्थित पावापुरी में प्रतिवर्ष दीपावली को विशाल मेला लगता है। पटना से 100 किमी एवं राजगृह से 38 किमी दूर इस पावन निर्वाण-भूमि पर लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष पहुँचते हैं और वहाँ भगवान महावीर की उपासना करते हैं।

सन् 1973-74 में देश-दुनिया में भगवान महावीर का 2500वाँ निर्वाण कल्याणक महोत्सव मनाया गया था। पच्चीसवीं निर्वाण शताब्दी पर 13 नवम्बर 1974 को भारतीय डाक विभाग ने 25 पैसे मूल्य वर्ग का स्मारक डाक टिकट जारी किया। डाक टिकट पर पावापुरी जलमन्दिर का चित्र अंकित किया गया। टिकट पर हिन्दी और अंग्रेजी में ‘भगवान महावीर की 2500वीं निर्वाण जयन्ती’ लिखा हुआ है।

इसी निर्वाण कल्याणक वर्ष में जैन आगम साहित्य, संस्कृति और परंपरा के आधार पर जैन धर्म का मंगल-प्रतीक तय किया गया, जिसे सभी सम्प्रदायों के आचार्यों, सन्तों और विद्वानों ने अनुमोदित किया। इस प्रतीक के नीचे ‘परस्परोपग्रहो जीवानाम्’ लिखा गया। यह आदर्श वाक्य संस्कृत भाषा के प्रथम जैन ग्रंथ ‘तत्वार्थ-सूत्र’ से लिया गया। वर्ष 2001 में जब भगवान महावीर का 2600वाँ जन्म कल्याणक महोत्सव मनाया गया, तब भारतीय सरकार द्वारा इसी जैन प्रतीक को अंकित करते हुए तीन रुपये मूल्य वर्ग का बहुरंगी डाक टिकट तथा पाँच रुपये का सिक्का जारी किया गया।

उल्लेखनीय है कि भगवान महावीर की 25वीं निर्वाण जयन्ती पर ही 1974 में सर्वसम्मति से पाँच रंगों वाला जैन ध्वज तय किया गया था। उसी वर्ष भारत-रत्न आचार्य विनोबा भावे की प्रेरणा से जैन धर्म की श्वेताम्बर-दिगम्बर सम्प्रदायों के प्राकृत भाषा के ग्रंथों के आधार पर ‘समणसुत्त’ पुस्तक तैयार की गई। देश व मानवता की सेवा के अनेक ऐतिहासिक कार्य भगवान महावीर की 2500वीं निर्वाण जयन्ती पर हुए थे।

अब पचास वर्ष बाद भगवान महावीर का 2550वाँ निर्वाण कल्याणक वर्ष (2023-24) देश दुनिया में विभिन्न साधनाओं, कल्याणकारी कार्यों और कार्यक्रमों के साथ मनाने की तैयारी है। युद्ध, हिंसा, असहिष्णुता, असंयम, आतंक और प्रदूषण के दौर में भगवान महावीर का पुनीत स्मरण संसार में सुख-शांति का संचार करने वाला बने। उनका हर कल्याणक प्राणीमात्र के कल्याण एवं जन-जीवन में अहिंसा, समता, सदाचार और प्रेम का आलोक प्रसारित करने का पावन निमित्त है। इस निमित्त से सबके उपादान शुभ, शुद्ध और समर्थ बनें।

-डॉ दिलीप धींग
(लेखक जैन धर्म के विद्वान है)

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