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जब भी देखा ताजमहल


जब भी देखा ताजमहल,कुछ खास बिंब आते हैं।
कुछ चिंता ,कुछ आश्चर्य,कुछ चिंतन दे जाते हैं।

ताजमहल सांस्कृतिक विरासत,इस पर प्रश्न खड़े।
कैसी यह संस्कृति जिस पर हैं, गहरे जख्म पड़े।
माना यह भी एक अजूबा,लेकिन किसका दम',
आज प्रशंसा हो भी पर, यह सच अब कौन लड़े।
सोच-सोच इसका सच कड़वा,दिली आह पाते हैं।
कुछ चिंता,कुछ आश्चर्य,कुछ चिंतन दे जाते हैं ।

ताजमहल इक महबूबा की, यादगार सुन्दर है।
किंतु खुद ए अपने में ही,गम का बड़ा समंदर है।
जितना जान सके इस पर,अब तक उतना लेकिन,
उससे कहीँ अधिक यह अब भी, उतना ही अंदर है।
सही सुना प्रतिभा में कुछ, यूँ ही प्राण गँवाते हैं।
कुछ चिंता, कुछ आश्चर्य,कुछ चिंतन दे जाते हैं ।

बाहर से सुन्दर और भीतर, से जो चीज नहीं भाए।
बाहर-भीतर, चारों ओर,असलियत नजर नहीं आए।
नकली साज-ओ-साज,भले स्थापित हुए जहाँ में पर,
कालांतर में हुए सिद्ध उतरा नकाब,खुद को खाए।
'सहज' वही रह पाते हैं जो,गम में गम खाते हैं ।
कुछ चिंता, कुछ आश्चर्य, कुछ चिंतन दे जाते हैं।

-डॉ. रघुनाथ मिश्र 'सहज', कोटा (राज.)

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