Subscribe Us

हिन्दी साहित्य के इतिहास की आधुनिक मीरा-महादेवी वर्मा पर परिचर्चा एवं काव्य गोष्ठी सम्पन्न

हैदराबाद। सूत्रधार साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था, हैदराबाद और विश्व भाषा अकादमी, भारत की तेलंगाना इकाई के संयुक्त तत्वावधान में गत दिनों 9 वीं मासिक गोष्ठी का ऑनलाइन आयोजन किया गया। जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार संस्थापिका सरिता सुराणा ने बताया कि यह गोष्ठी दो सत्रों में आयोजित की गई। प्रथम सत्र में छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा के रचना-संसार पर परिचर्चा की गई और द्वितीय सत्र में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जन्म जयन्ती, गणतंत्र दिवस और बसन्त ऋतु पर काव्य गोष्ठी की गई। इस गोष्ठी की अध्यक्षता हैदराबाद शहर के जाने-माने नाटककार और कवि सुहास भटनागर ने की। ज्योति नारायण की सरस्वती वन्दना से कार्यक्रम का शुभारम्भ हुआ। तत्पश्चात् अध्यक्ष ने सभी अतिथियों और सदस्यों का शब्द-पुष्पों से स्वागत किया।


उसके बाद संस्था की सदस्य मंजुला दूसी के पतिदेव के आकस्मिक निधन पर और हैदराबाद के वरिष्ठ कवि अजीत गुप्ता के पिताजी, जो स्वयं बहुत अच्छे कवि थे के निधन पर शोक प्रकट किया गया और दो मिनट का मौन रखा गया। फिर प्रथम सत्र की चर्चा को प्रारम्भ करते हुए संयोजिका सरिता सुराणा ने महादेवी वर्मा का जीवन परिचय प्रस्तुत करते हुए कहा कि हिन्दी साहित्य में आधुनिक मीरा कही जाने वाली छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा का जन्म 26 मार्च सन् 1907 को होली के दिन फर्रुखाबाद (उत्तर-प्रदेश) में हुआ था। उनके पिता श्री गोविन्द प्रसाद वर्मा प्रतिष्ठित कवि थे और माता श्रीमती हेमरानी देवी विदुषी महिला थीं, वे भी कवयित्री थीं। उन्हें संस्कृत और हिन्दी भाषा का अच्छा ज्ञान था। वे धार्मिक प्रवृत्ति की थीं तो उन्होंने महादेवी को तुलसीदास, सूरदास और मीराबाई का साहित्य पढ़ाया। इनके नानाजी भी ब्रजभाषा के कवि थे। यही कारण है कि बाल्यकाल से ही साहित्यिक परिवेश मिलने के कारण महादेवी की रुचि कविता लेखन में जागृत हो गई।


उनकी प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर में हुई थी। 9 वर्ष की बाल्यावस्था में ही इनका विवाह स्वरुपनारायण वर्मा के साथ कर दिया गया। इनके ससुर स्त्री शिक्षा के पक्ष में नहीं थे इसलिए उनकी विद्यालयीन शिक्षा वहीं पर रुक गई लेकिन उनके निधन के पश्चात् महादेवी ने अपनी शिक्षा पुनः प्रारम्भ की। फिर एक के बाद एक सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए इन्होंने वर्ष 1928 में क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज से बीए और वर्ष 1933 में संस्कृत में एम ए की परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद ये प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या नियुक्त हो गईं। 


उन्होंने जीवन पर्यन्त महिलाओं की मुक्ति, शिक्षा और विकास के लिए कार्य किया। लेखन, सम्पादन और अध्यापन ही उनका कार्यक्षेत्र रहा। वे अपने वैवाहिक जीवन से पूर्णतया विरक्त थीं। शादी के बाद उनके पति लखनऊ मेडिकल कॉलेज के बोर्डिंग हाउस में रहने चले गए और ये इलाहाबाद के क्रास्थवेट गर्ल्स कॉलेज में पढ़ने चली गईं। इनके बीच कभी-कभी पत्राचार होता था और उनके पति उनसे मिलने के लिए इलाहाबाद आते थे। उन्होंने महादेवी के कहने के बावजूद दूसरी शादी नहीं की। सन् 1966 में जब उनकी मृत्यु हो गई तो वे स्थायी रुप से इलाहाबाद में बस गईं।


महादेवी वर्मा ने गद्य और पद्य दोनों ही विधाओं में लेखन कार्य किया। उनके कुल 8 कविता-संग्रह प्रकाशित हुए, जिनमें प्रमुख हैं- नीहार, रश्मि, नीरजा, सांध्यगीत और दीपशिखा आदि। रेखाचित्रों में 'अतीत के चलचित्र' और 'स्मृति की रेखाएं'। उनके संस्मरण 'पथ के साथी' और 'मेरा परिवार' में संकलित हैं। इसके अलावा उन्होंने अनेक निबन्ध और कहानियां भी लिखीं। उन्हें उनकी कृति 'यामा' के लिए भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार प्रदान किया गया। और भारत सरकार ने उनके साहित्यिक योगदान को देखते हुए उन्हें 'पद्म भूषण' सम्मान प्रदान किया।


चर्चा को आगे बढ़ाते हुए सुनीता लुल्ला ने कहा कि महादेवी वर्मा में करुणा का अथाह सागर बहता था। वे छोटे-से छोटे जीव में भी अपने समान ही चेतना शक्ति महसूस करती थीं। यहां तक कि उनके लिए ईश्वर भी करुणा के पात्र थे। अनेक उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने उनके रचना-संसार के बारे में जानकारी दी। रिमझिम झा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वे महादेवी से बचपन से ही बहुत प्रभावित हैं। हम उनके जैसा तो नहीं बन सकते लेकिन उनकी करुणा और प्रेम की भावना को अपने अन्दर आत्मसात करके मानव मात्र से प्रेम कर सकते हैं। यही हमारी उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। 


ज्योति नारायण ने कहा कि यह उनका सौभाग्य है कि जब वे एक वर्ष की थीं तो महादेवी जी उनके घर आई थीं और उन्होंने उनको गोद में उठाया था। उनके पिताजी साहित्यिक गतिविधियों में संलग्न रहते थे इसलिए उनके घर में साहित्यकारों का आना-जाना लगा रहता था। वे रामगढ़ कस्बे के उमागढ़ गांव भी गई थीं, जहां पर महादेवी जी ने एक बंगला बनवाया था और उसका नाम 'मीरा मंदिर' रखा था। अब वह 'महादेवी साहित्य संग्रहालय' के नाम से जाना जाता है। गजानन पाण्डेय ने उनके रेखाचित्र 'भक्तिन' पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए। अध्यक्षीय टिप्पणी करते हुए सुहास भटनागर ने कहा कि हम उनके जितनी साहित्यिक ऊंचाइयों को तो नहीं छू सकते लेकिन उन्होंने उसे जहां पर छोड़ा, वहां से एक नई शुरुआत कर सकते हैं। साथ ही उनके गीतों से प्रेरणा लेकर उनके सम्मान में नए गीत रच सकते हैं। सभी सदस्यों ने उनके इन सुझावों का उत्साहपूर्वक समर्थन किया।


द्वितीय सत्र में भावना पुरोहित ने 'गाय और गौरी' पर और संगीता जी.शर्मा ने 'रोज एक यज्ञ बना करता हूं मैं' रचनाएं प्रस्तुत की। बिनोद गिरि ने भोजपुरी भाषा में 'चीर के करेज के खून से' गीत प्रस्तुत किया तो गजानन पाण्डेय ने 'वे भारत के वीर सुभाष थे' रचना का पाठ किया। सिलिगुड़ी, पश्चिम बंगाल से जुड़ी कवयित्री रूबी प्रसाद ने 'हिन्द देश के हम निवासी, हमें एक होना चाहिए' रचना का पाठ किया तो रांची, झारखण्ड निवासी ऐश्वर्यदा मिश्रा ने अपने बचपन की यादों को ताजा करते हुए एक संस्मरण 'बचपन की 26 जनवरी' को सबके साथ साझा किया। चन्द्र प्रकाश दायमा ने 'आत्मा तुम्हारी भी परमात्मा हो जाएगी, गर दूसरों के दुःख को कलेजे से लगाओगे' सुनाकर श्रोताओं की वाहवाही बटोरी। 


सुनीता लुल्ला ने महादेवी के गीतों से प्रेरणा लेकर एक गीत 'है शपथ तेरी तुझे हर रात जलना, दीप मेरे जल तुझे क्या हो गया है' की सुन्दर प्रस्तुति दी तो ज्योति नारायण ने 'अन्याय नित जो सहते, फिर करते सदा पलायन' रचना का पाठ किया। कटक, उड़ीसा निवासी रिमझिम झा ने 'आओ कथा सुनाएं नेताजी सुभाष चन्द्र महान की' सुनाकर नेताजी की जन्म जयन्ती पर उन्हें सादर नमन किया। बांसवाड़ा, राजस्थान से उर्मिला पुरोहित ने संयुक्त परिवारों की विशेषताओं को याद करते हुए एक संवेदनशील रचना 'आज स्मृति में बीते पल को देखा' सुनाकर सबको भावुक कर दिया। प्रदीप देवीशरण भट्ट ने अपनी ओजपूर्ण रचना 'उठो जवानों धरा पुकारे, सरहद पर दुश्मन ललकारे' की बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति दी। 


वरिष्ठ गज़लकार जगजीवन लाल अस्थाना 'सहर' ने अपनी गज़ल का ये लाजवाब शे'र प्रस्तुत करके श्रोताओं की तालियां बटोरी कि 'दिल मेरा इस सलीके से जलता दिखाई दे, आए धुआं नज़र में न शोला दिखाई दे'। सरिता सुराणा ने महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध कविता 'मैं अनन्त पथ में लिखती जो, सस्मित सपनों की बातें, उनको कभी न धो पाएंगी, अपने आंसू से रातें' का पाठ करके सबको भावविभोर कर दिया। हर्षलता दुधोड़िया, नेहा सुराणा और सदन कुमार जैन (मेरठ, उत्तर-प्रदेश) ने भी गोष्ठी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 


अध्यक्षीय काव्य पाठ करते हुए सुहास भटनागर ने एक लघु कहानी 'ब्यूटीफुल डेट' का मनोरंजक तरीके से वाचन किया। उनके अनुसार किसी भी नज्म और कविता के जन्म से पहले वह एक कहानी से होकर गुजरती है। उनका प्रस्तुतिकरण लाजवाब था, सभी सदस्यों ने उनकी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की। उन्होंने सभी सदस्यों से अनुरोध किया कि वे मोबाइल में देखकर पढ़ने की अपेक्षा डायरी में हाथ से लिखकर पढ़ें, उससे हमारा रचना से जुड़ाव और गहरा होता है। अध्यक्षा ने सभी सदस्यों एवं देश भर से जुड़े अतिथि साहित्यकारों का हार्दिक आभार व्यक्त किया। ज्योति नारायण के धन्यवाद ज्ञापन के साथ गोष्ठी सम्पन्न हुई।

टिप्पणी पोस्ट करें

1 टिप्पणियां