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एक आस लिए बैठी हूं


✍️पूनम चौहान


तकदीर में हो नहीं, फिर भी एक आस लिए बैठी हूं।
काश मिल जाए मेरे प्रेम को संबल एक विश्वास लिए बैठी हूं।
बंद आंखों से एक बार मेरे हालात का अहसास तो करो,
तेरी एक झलक की तलाश में मैं कब से उदास बैठी हूं।
झिलमिल सितारों की तरह रोशन रहे जीवन तेरा,
काली स्याह रात में मुट्ठी भर प्रकाश लिए बैठी हूं।
माना कि साथ हो नहीं, पर यादें तो है तेरी जहन में,
तेरे साथ गुजरे वक्त का सुखद आभास लिए बैठी हूं।
नहीं समझी अभी तक मैं मुहब्बत थी या समझौता,
अतृप्त धरा बनकर शीतल बूंद की प्यास लिए बैठी हूं ।
सोचा था कभी कोई तल्खी हमारे दरमियां नहीं आएगी,
तेरे इश्क की जद में अपनी हर सांस कुर्बान किए बैठी हूं।
कौन कहता है कि दिल को सुकून देती है मुहब्बत ,
तड़पती रूह में जीवन का उल्लास लिए बैठी हूं।
कैसे पाऊँ उसको कोई राह तो दिखा दे ऐ खुदा,
श्याम रंग में मीरा बनकर मन को अनुरागी बना बैठी हूं।
हमें मालूम था एक दिन बिछड़ना सब को पड़ता है,
फिर भी खुदा से मिलन की अरदास लिए बैठी हूं।।   


*मुरादाबाद  (उत्तर प्रदेश)


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