हिंदी नाटक और रंगमंच पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न
देश के वरिष्ठ नाटककारों और विशेषज्ञों का हुआ सारस्वत सम्मान
उज्जैन। सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला द्वारा पीएम उषा योजना के अंतर्गत एमपी कॉन, भोपाल के सहयोग से छह दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। गुरुवार को समापन दिवस पर हिंदी नाटक और रंगमंच: विविध धाराएँ और इतिहास पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न हुई, जिसके मुख्य अतिथि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी एवं वरिष्ठ लेखक श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे थे। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ शिव चौरसिया ने की। सारस्वत अतिथि पद्मश्री भगवतीलाल राजपुरोहित, वरिष्ठ लेखक श्री माधव नागदा, उदयपुर, राजस्थान, कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा, प्रो प्रेमलता चुटैल, प्रो गीता नायक, प्रो सत्यवती त्रिपाठी, डॉ तुलसीदास परोहा, प्रो जगदीश चंद्र शर्मा, डॉ प्रतिष्ठा शर्मा, सुंदरलाल मालवीय आदि ने संगोष्ठी में प्रकाश डाला। देश के वरिष्ठ नाटककारों एवं विशेषज्ञों को अंग वस्त्र, सूत की माला, श्रीफल एवं साहित्य भेँट कर उनका सारस्वत सम्मान किया गया।
मुख्य अतिथि केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो राधावल्लभ त्रिपाठी ने अपने उद्बोधन में भारतेंदु और प्रसाद के रंगमंच तथा नाट्य दृष्टि पर व्यापक चर्चा करते हुए कहा कि तद्युगीन ब्रिटिश सत्ता के प्रतिवाद और प्रतिरोध के सबसे प्रबल स्वर भारतेंदु और जयशंकर प्रसाद में हमें दिखाई देते हैं। भारतेंदु की मंडली ने कई नाटक लिखे और रंगमंच को समृद्ध बनाया। प्रसाद ने भारतीय रंगमंच की पहचान के साथ नाटक कैसे होने चाहिए, इस पर व्यापक चिंतन किया है। उनके नाटकों में कई ऐसे उदाहरण हमें मिलते हैं, जिन पर शोध कार्य किया जा सकता है। प्रसाद काव्य और कला के विषय में चिंतन करते हैं। प्रसाद मानते हैं कि काव्य से ऊंची कोई वस्तु नहीं। काव्य आत्मा की संकल्पात्मक अनुभूति है।
नाटककार पद्मश्री भगवतीलाल राजपुरोहित ने अपने वक्तव्य में कहा कि बिना उत्साह के आप कुछ भी काम नहीं कर सकते हैं। राजा भोज ने शृंगार को महत्व दिया वहीं कई आचार्यों ने उत्साह को नाटक की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना है। नाटक समाज को अपना विषय बनता है। प्राचीन काल में सामाजिक उत्सव होते थे जिनमें नाटक हुआ करते थे। हमें आज कलाकार को प्रोत्साहन देना चाहिए और नाट्य कला को प्रोत्साहित करना चाहिए। देश में नाट्यशास्त्र से संबंधित केंद्र होने चाहिए जिसमें वर्तमान तकनीक का समावेश भी किया जाए। ओस्लो नॉर्वे के वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश चंद्र शरद आलोक ने अपने वक्तव्य में बर्नाड शा और इब्सन के नाटकों के हिंदी अनुवाद पर चर्चा की और बताया कि इब्सन पीड़ा के नाटककार है, उनका डॉल्स हाउस प्रसिद्ध नाटक है।
कुलानुशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि नाटक को भारतीय साहित्य एवं कलारूपों में सर्वोपरि महत्त्व मिला है। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र भारत की समस्त कलाओं, शिल्प और साहित्य चिंतन का विश्वकोश है। हिंदी नाटकों ने राष्ट्र और समाज के पुनर्जागरण से लेकर व्यापक बदलाव की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समकालीन नाटकों ने अपने युगजीवन, परम्परा और प्रयोग के साथ सम्बंध बनाते हुए नित नए रूपों को विकसित किया है। प्रो प्रेमलता चुटैल ने अपने वक्तव्य में रेडियो नाटक पर चर्चा करते हुए कहा कि कलाकार नाटक में इतना उतर जाता है कि कई दिनों तक वह उस अभिनय से बाहर नहीं आ पाता। किसी दूसरे की आत्मा और काया में प्रवेश करना ही नाट्यकला है। रेडियो नाटक के लिए ध्वनि, ध्वनि के लिए संगीत और प्रकाश आवश्यक है। प्रो. गीता नायक ने अपने वक्तव्य में मोहन राकेश के नाटकों के पात्रों के मनोभावों और उनके कायिक भावों पर विस्तार से चर्चा की। श्री सुंदरलाल मालवीय ने अपने वक्तव्य में माच पर चर्चा की और बताया कि माच की अभिव्यक्ति गेय पद्धति में होती है और माच में संवाद भी गेय रूप में होते हैं।
प्रारम्भ में सरस्वती वंदना श्रीमती सीमा देवेंद्र जोशी ने की। तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ शिव चौरसिया ने की। प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे ने अपने नाट्यानुभव सुनाए। डॉ नेत्रा रावणकर ने शोध पत्र प्रस्तुति की। सीमा पंड्या ने लघु एकांकी सुनाई। सुंदरलाल मालवीय ने शकुंतला माच के गीतों की प्रस्तुति की। आयोजन में रंगकर्मी श्री सतीश दवे, श्री मुकेश जोशी, श्री संतोष सुपेकर, मानसिंह शरद, प्रकाश देशमुख, सुंदरलाल मालवीय, भूषण जैन आदि सहित अनेक साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, शोधार्थी और विद्यार्थी उपस्थित थे। यह संगोष्ठी विख्यात मनीषी आचार्य कमलेशदत्त त्रिपाठी की स्मृति को समर्पित थी। कार्यक्रम का संचालन डॉ प्रतिष्ठा शर्मा एवं शोधार्थी पूजा परमार ने किया और आभार प्रदर्शन प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा एवं पूजा परमार ने किया।


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