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कचरे की गाड़ी वाला


✍️विजय जोशी 'शीतांशु'


रमेश के काम काज को लेकर, पत्नी द्वारा बात तलाक तक पहुँच गई। आज आखरी सुनवाई के साथ ममता को रमेश से तलाक मिलने ही वाला है। ममता भी तो यही चाहती थी।
नगर निगम की शासकीय नौकरी देख कर पिता में ममता का विवाह रमेश के साथ कर दिया था।  ममता को रमेश से पारिवारिक, मानसिक या शारीरिक कोई  परेशानी नहीं थी।
वह निगम  ऑफिस में साहब की गाड़ी चलाता था, जब तक तो ठीक था। पानी का टेंकर चलाने लगा वहाँ तक भी ठीक था। लेकिन अब ममता को रमेश के द्वारा कचरे की गाड़ी चलाने का काम रास नहीं आ रहा था। लोगों का "कचरे की गाड़ी वाला आया" बोलना शूल की तरह उसे चुभता था।बस यही तलाक का कारण था। आखिर मोहल्ले में कब तक उसे कचरे की गाड़ी वाले की पत्नी होने  का ताना सुनना पड़ेगा। वह इस अपमान के  जंजाल से निकलना चाहती थी।
लेकिन आज रमेश अपने ऑफिस में एक बड़ा आयोजन होने वकील साहब के घर नहीं आ सका। उसने दो दिन बाद की तारीख ले ली थी।  ममता को इस बात पर बहुत गुस्सा आ रहा था। ममता को  दो दिन, दो साल से प्रतीत होने लगे?
सुबह अखबार  में नगर निगम के आयोजन की खबर छपी थी। पूरे देश में अपने नगर को स्वछता में नंबर वन रखने के लिए  सभी कचरा वाहन चालकों को सम्मानित किया गया। और कचरा गाड़ी रूट कुशल प्रबन्ध के लिए रमेश को पूरे शहर के सामने मेयर  साहब व प्रभार मंत्री द्वारा 11 हजार नकद व  साल फूल माला से सम्मानित किया गया। रमेश की वाहवही होने लगी।
वकील साहब तलाक के पेपर लेकर, ममता के घर आये। ममता  ने सहमति हस्ताक्षर की जगह  पेपरों को  आग के हवाले कर दिये। जिस पर वह रमेश के लिए विशेष खाना बना रही थी।


*महेश्वर जिला खरगोन


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