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भारत माता की,व्यथा सुनाने आयी हूँ




✍️रीना गोयल 

ओढ़ निराशा का आँचल जो ,क्रंदन को मजबूर हुई ।

विवश उसी भारत माता की,व्यथा सुनाने आयी हूँ ।

 

छंद लिखें कितने कवियों ने ,अधर ,नयन, मुख,गालों पर ।

रुदन नहीं क्यों लिख  पाये वो,  रिसे पाँव के छालों पर ।

मौन हुए भारत के जन भी  ,निर्धन की निर्धनता पर ।

दुबके रहे घरों के भीतर ,झांके नहीं विवशता पर ।

मैं अबोल माँ के जायों की ,पीड़ा गाने आयी हूँ ।

विवश उसी भारत माता की,व्यथा सुनाने आयी हूँ ।

 

अफरा -तफरी मची हुई है,और अभी हाँ और मिले ।

 शानों शौकत ,गाड़ी, बंगला ,धन दौलत पुरजोर मिले ।

दिन ढलते ही जा मदिरालय,रूप रसों का पान करें ।

घुँघरू ,ठुमकों में रम कर वो ,यौवन का गुणगान करें ।

असली सूरत उनकी जन-जन ,को दिखलाने आयी हूँ ।।

विवश उसी भारत माता की,व्यथा सुनाने आयी हूँ ।

 

रिश्वतखोरी ,सीनाजोरी ,ये सब बातें आम हुई ।

मजहब चला बैर के रस्ते ,अच्छाई नाकाम हुई ।

दुनियां भले चाँद पर पहुँची,शिक्षा ठंडे बस्ते में ।

महँगाई ने रोटी छीनी ,रक्त बहा है सस्ते में ।

कितना और अभी सोओगे ,जगो जगाने आयी हूँ ।

विवश उसी भारत माता की,व्यथा सुनाने आयी हूँ ।

 

नशे सरोवर में मत डूबो ,युवा शक्ति तुम भारत की ।

तोड़ फोड़ कर देश धरोहर ,क्यों करते हो बरबादी ।

कर्म विवेकानन्द से करो ,जनमानस का मान बनो ।

अपनी ताकत को पहचानों ,इतने मत नादान बनों ।

भारत माँ की करो सुरक्षा यह समझाने आयी हूँ ।

विवश उसी भारत माता की,व्यथा सुनाने आयी हूँ ।

 

 


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