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वह बादल बदमाश



✍️टीकम चन्दर ढोडरिया

बुझा गया तुमकों भिगो, अपनें मन की प्यास।

आया ना फिर लौट कर, वह बादल बदमाश।।

 

ऐसे भी छत पर प्रिये, करों नहीं स्नान।

बरस पड़ेगा टूट कर, बादल है नादान।।

 

बादल था कुछ ओर था,ऐसा  बरसा रात।

उमड़ी नदियाँ प्रीति की, खिला धरा का गात।

 

बादल नें कुछ इस तरह, किया उसे  बदनाम।

उमड़ घुमड़ लिखता रहा,नभ में उसका नाम।।

 

कब तक रखता रोक कर,बादल उर की पीर।

बरस पड़ा है आज तो,  देखो  बनकर  नीर।।

 

छोड़ों भी आवारगी, मत भटकों बिन बात।

एक ठौर अब ठहर कर, करों मेघ बरसात।।

 

सकुचाई लेटी रही, कहती किससे पीर।

मेघों नें खींची बहुत, नदिया की तस्वीर।।

 

हवा चली आँचल उड़ा, उघड़ा कोमल गात।

निरख-निरख बादल उसे, बरसा सारी रात।।

 

बादल आये पाहुनें, रिमझिम  बरसा  मेह, 

महक उठी निज-गंध से, धुली धरा की देह।।

 

बिखराओं छत पर प्रिये,आकर काले केश।

आ जाये शायद खिंचे, मेघा अपनें  देश।।

 

कई जतन हमनें किये, हुये सभी बेकार।

तुम्हीं बताओं मेघ अब, बरसोगे कब यार।।

 

बादल भी करनें लगे,हमसे आज मजाक।

तोला भर बरसे कभी, बरसे कभी छटाक।।

*छबड़ा, जिला बारां,राजस्थान

 


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