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समन्दर ग़मों का था मुझ में



*हरगोविंद मैथिल








समन्दर ग़मों का था मुझ में ।

दरिया सा बहता था मुझ में ।।

 

दर्द भी था हद से जियादा ।

मोम सा जो पिघला था मुझ में ।।

 

दर्प अना का भी था ऐसा ।

जो अब पनप रहा था मुझ में ।।

 

लोग यहांँ कहते हैं अब तक ।

कितना ज़ह्र भरा था मुझ में ।।

 

ढूंँढ़ रहा था जिसे ज़हां में ।

मैथिल  मुझे मिला था मुझ में ।।

 

*विदिशा


 


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