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मैं तो छतरी मांग रही थी!





















*अजय कुमार व्दिवेदी

चाँद को एक दिन देखते-देखते! अपने घर के आंगन से।

उठता मन में एक प्रश्न! पूछ लिया था साजन से।

 

हे प्रियतम मेरे मुझे बताओं! मैं कैसी तुमको लगतीं हूँ।

क्या चाँद की तरह ही सुन्दर! मैं भी तुमको दिखतीं हूँ।

 

साजन मेरे कुछ न बोलें! होले से मुस्काएं।

मन ही मन कुछ सोच रहे थे! अपना शीश झुकाएं।

 

हृदय मेरा व्याकुल था अपने! साजन के मुख से सुनने को।

अपने प्रियतम के व्दारा खुद को! चाँद सरीखा चुनने को।

 

बार बार जब पूछा मैंने! हौले से वो बोलें।

बात कह रहा हूँ सच्ची! रखना पट को खोले।

 

मन मन्दिर में रहती हो तुम! हृदय की मेरे रानी हो।

बात को मेरे समझोगी तुम! तुम तो बड़ी सयानी हो। 

 

खुद को चाँद से जोड़ों न तुम! चाँद में तो दाग है।

तुम्हारी उपमा चाँद से प्यारी! दामन तुम्हारा साफ है।

 

इससे ज्यादा क्या मैं बोलूँ! बात हृदय से निकली है।

ना ही शब्द बनाएं मैंने! न जिभ्या ही फिसली है।

 

इतना कह कर चुप हो गये! फिर से खुद में ही खो गये।

हृदय को मेरे प्यारे थे अब! अन्तर्मन को भी छू गये।

 

सुन कर सजन की बातों को! अपार सुख था मिला मुझे।

रहा नहीं जीवन से अपने! अब कोई भी गिला मुझे। 

 

कई बार जब प्रश्न किया तब! जाके उत्तर मिला मुझे।

मैं तो छतरी मांग रही थी! पूरा अम्बर मिला मुझे।

 

*अजय कुमार व्दिवेदी

सोनिया विहार दिल्ली 








 














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