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तख्त के लिए तकरार(कविता)


तख्त के लिए तकरार हो गई,
ये सियासत तो बड़ी ही समझदार हो गई,,
शातिर सियासतबाज तो सब पार लग गए,
बाकी के लिए मंझदार हो गई,,
बनकर आए थे मेहमान जो कुछ पल के यहाँ,
उनके लिए भी सियासत घर-बार हो गई,,
सत्ता का मद कुछ ऐसा चढ़ा यारों,
इसमें डूबे गूंगों की भी फिर से जिन्दा ललकार हो गई,,
टिकट मिल गया तो सब सच्चे साथी, 
नहीं मिला तो पार्टी ही गद्दार हो गई,,
तर्क और तथ्य सब गौण हो गए,
झूठे आरोपों की बौछार हो गई,,
बेमानी मुद्दों पर तो अक्सर ही दमदार दिखी,
असल मुद्दों पर ही बिन मुठ की तलवार हो गई,,
सत्ता के लिए सौदें समझौतें खुलेआम हो रहे,
सियासत मिशन नहीं व्यापार हो गई,,
बुराईयों का ही बोलबाला दिखा यहाँ,
सच्ची शख्सियतें सभी लाचार हो गई,,
स्वार्थ से प्रेरित आचरण का आधिपत्य हो गया,
मर्यादाएँ राजनीति की तार-तार हो गई,,।


*विवेक जगताप (कुमार विवेक), राजबाड़ा चौक, धरमपुरी जिला धार (म.प्र.),मो.-95840909697000338116


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