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बटुआ(लघुकथा)


*माधुरी शुक्ला

नीरज घर से जैसे ही बाहर निकला उसे पड़ोस में रहने वाली  रमा ताई जल्दबाजी में  रिक्शा पकड़कर कहीं जाती दिखीं। इस जल्दबाजी में झोले से उनका  बटुआ गिर गया।

 

यह देख नीरज ने आवाज भी लगाई पर उन तक नहीं पहुंची। उसने फौरन बाइक स्टार्ट की और रिक्शा का पीछा शुरू किया। रास्ते भर सोचता रहा  जब और जहां रिक्शा रुके वह पहुंच जाए ताकि ताई को रिक्शा वाले के आगे अपमानित ना होना पड़े। 

 करीब दो किलोमीटर बाद दवाई की दुकान के सामने रिक्शा रुका। रिक्शा भाड़ा चुकाने के लिए ताई ने झोले से बटुआ निकालना चाह । बटुआ ना पाकर वह घबरा गई। तभी नीरज वहां पहुंचा और बोला ये रहा आपका बटुआ। गिर गया था घर के सामने ही। बटुए से रुपये निकालकर रिक्शा वाले का भाड़ा चुकाती हुई ताई नीरज को खूब सारी दुआ देने लगी।

 


*माधुरी शुक्ला 106 हाउस नम्बर, 3 रंगपुर रोड ,डडवाड़ा कोटा (राजस्थान )मो.6375060554

 


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