दीपावली की रात खुलते हैं भविष्य के रहस्य, अष्टधातु के पासों पर टिका है रमल विद्या का संसार
भारतीय ज्ञान परंपरा की विलक्षण विधा है रमल शास्त्र, राजघरानों से लेकर जौहरी परिवारों तक रही है इसकी विशेष प्रतिष्ठा
भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा जितनी विस्तृत है, उतनी ही रहस्यमयी और विलक्षण भी। यहां ज्योतिष, अंकगणित, हस्तरेखा, सामुद्रिक शास्त्र और अनेक ऐसी विद्याएं विकसित हुईं, जिनके माध्यम से मनुष्य अपने जीवन, समय और परिस्थितियों को समझने का प्रयास करता रहा है। इन्हीं विशिष्ट विद्याओं में एक नाम है रमल विद्या। यह ऐसी प्राचीन विद्या है, जिसके माध्यम से विशेष प्रकार के पासों और गणनाओं के आधार पर व्यक्ति के प्रश्नों का उत्तर तथा संभावित भविष्यफल जानने का प्रयास किया जाता है। इस विद्या की सबसे रोचक विशेषता यह है कि इसका विशेष संबंध दीपावली की रात्रि से माना जाता है। मान्यता है कि दीपावली से रमल विद्या का नया वर्ष आरंभ होता है और इसी रात आगामी वर्ष के फलादेश निकालने की परंपरा रही है।
रमल विद्या का इतिहास राजदरबारों और रियासतों की परंपराओं से जुड़ा बताया जाता है। पुराने समय में जब जीवन के अनेक महत्वपूर्ण निर्णयों के लिए ज्योतिषीय परामर्श लिया जाता था, तब रमल शास्त्र का भी विशेष महत्व था। राजघरानों, प्रतिष्ठित परिवारों और जौहरी समाज में इस विद्या के जानकारों का सम्मान रहा है। दीपावली की रात जब घर-आंगन दीपों से आलोकित होते थे, तब कुछ परिवारों में रमल चौपड़ सजाई जाती थी और अष्टधातु के पासों के माध्यम से आने वाले वर्ष की संभावनाओं का आकलन किया जाता था। यह केवल भविष्य जानने की जिज्ञासा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक विशिष्ट पारिवारिक और सांस्कृतिक परंपरा भी थी।
अष्टधातु के पासे और रमल चौपड़ का रहस्य
रमल विद्या की प्रक्रिया अपने आप में अत्यंत रोचक है। इसमें विशेष रूप से तैयार किए गए अष्टधातु के पासों का उपयोग किया जाता है। परंपरागत रूप से इन पासों को विधि-विधान से शुद्ध करके रमल चौपड़ पर फेंका जाता है। पासों से प्राप्त संकेतों और उनसे निर्मित विशेष आकृतियों के आधार पर गणना की जाती है। इन आकृतियों को ज्यामितीय स्वरूप में समझते हुए रमल शास्त्र के निर्धारित नियमों के अनुसार निष्कर्ष निकाले जाते हैं। यही कारण है कि इस विद्या को केवल पासों का खेल समझना इसकी वास्तविक प्रकृति को न समझने जैसा होगा। इसके पीछे एक विशिष्ट गणना पद्धति, संकेत व्यवस्था और पारंपरिक ज्ञान का संसार है।
रमल चौपड़ पर पासों की स्थिति के अनुसार अलग-अलग योग बनते हैं। इन योगों के आधार पर व्यक्ति के प्रश्नों का विश्लेषण किया जाता है। व्यापार में लाभ-हानि, नए व्यवसाय की शुरुआत, भवन निर्माण, पारिवारिक परिस्थितियां, यात्रा, कार्यों में सफलता और जीवन की अन्य जिज्ञासाओं को लेकर रमल शास्त्री से परामर्श लिया जाता रहा है। इस पद्धति में भूत, वर्तमान और भविष्य से जुड़े प्रश्नों का विवेचन करने की परंपरा है।
दीपावली की रात ही क्यों है विशेष?
दीपावली भारतीय संस्कृति में केवल प्रकाश और उत्सव का पर्व नहीं, बल्कि नए संकल्पों, नई शुरुआत और मंगलकामनाओं का अवसर भी है। कार्तिक अमावस्या की रात्रि को लक्ष्मी पूजन, साधना और आध्यात्मिक उपासना के लिए विशेष महत्व दिया गया है। इसी रात्रि को रमल विद्या के वार्षिक फलादेश के लिए भी विशिष्ट माना जाता है। परंपरा के अनुसार दीपावली से रमल का नया साल आरंभ होता है। इसीलिए इस रात रमल के जानकार आगामी वर्ष की गणना करते हैं और वर्षभर की संभावनाओं का आकलन करते हैं।
जयपुर में आज भी कुछ राजघरानों और जौहरी परिवारों में दीपावली की रात रमल विद्या से वर्षफल निकालने की परंपरा का उल्लेख मिलता है। यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय समाज में प्राचीन विद्याएं केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि पारिवारिक संस्कारों और व्यवहार का हिस्सा भी बनी रहीं।
जयपुर में आज भी जीवित है परंपरा
रमल विद्या के जानकार आचार्य अनुपम जौली के अनुसार, दीपावली पर रमल के पासों से आगामी वर्षफल निकालने की परंपरा राजाओं के समय से चली आ रही है। इस अवसर पर पासों का पंचोपचार से शुद्धिकरण किया जाता है और फिर रमल चौपड़ पर प्राप्त संकेतों के आधार पर वर्षफल तैयार किया जाता है। उनके अनुसार जयपुर में आज भी इस परंपरा को मानने वाले परिवार हैं। रमल विद्या में रुचि रखने वाले लोग इसे केवल भविष्य कथन का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय पारंपरिक ज्ञान की एक विशिष्ट पद्धति के रूप में देखते हैं।
इस विद्या के प्रति विदेशों में भी जिज्ञासा बढ़ने की बात सामने आती रही है। विशेषकर ऑनलाइन माध्यमों से भारतीय पारंपरिक विद्याओं को जानने और सीखने की इच्छा रखने वाले लोग रमल शास्त्र की ओर आकर्षित हो रहे हैं। रमल विद्या की गणना पद्धति और उसमें बनने वाली ज्यामितीय आकृतियां जिज्ञासु लोगों के लिए अध्ययन का विषय हैं।
संरक्षण की आवश्यकता है प्राचीन ज्ञान का यह अध्याय
समय के साथ अनेक पारंपरिक विद्याएं धीरे-धीरे विस्मृति के गर्त में चली गईं। कुछ विद्याएं आज भी सीमित परिवारों और साधकों तक सुरक्षित हैं। रमल विद्या भी ऐसी ही परंपराओं में शामिल है, जिसे व्यवस्थित रूप से समझने, उसके प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करने और उसकी गणना पद्धति का दस्तावेजीकरण करने की आवश्यकता है। आधुनिक तकनीक के इस दौर में ऑनलाइन शिक्षण और डिजिटल अभिलेखन के माध्यम से ऐसी विद्याओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जा सकता है।
यह भी आवश्यक है कि पारंपरिक मान्यताओं और उनके वैज्ञानिक प्रमाणों के बीच अंतर को समझते हुए इनका अध्ययन किया जाए। भविष्यफल संबंधी दावों को प्रमाणित तथ्य के रूप में नहीं, बल्कि परंपरागत विश्वास और ज्ञान-पद्धति के रूप में देखना चाहिए।
वास्तव में रमल विद्या का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि अष्टधातु के पासों से भविष्य के प्रश्नों के उत्तर खोजे जाते हैं, बल्कि इस बात में भी है कि यह भारत की विविधतापूर्ण ज्ञान-संपदा का एक अनूठा अध्याय है। दीपावली की जगमगाती रात में जब एक ओर दीपक अंधकार को दूर करते हैं, वहीं दूसरी ओर रमल चौपड़ पर गिरते पासे मनुष्य की अनंत जिज्ञासाओं को एक नई दिशा देने का प्रयास करते हैं। शायद यही इस प्राचीन परंपरा का सबसे रोचक पक्ष है कि समय बदलता रहा, पीढ़ियां बदलती रहीं, लेकिन भविष्य को जानने की मनुष्य की जिज्ञासा आज भी उतनी ही जीवंत है।
आचार्य अनुपम जौली
रमलाचार्य, जयपुर




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