लघुकथा सुलाने की नहीं, जगाने की विधा : डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा
नवगठित ‘उज्जैन लघुकथा मंच’ ने आयोजित किया प्रेमचंद पुण्य स्मरण दिवस
उज्जैन। नवगठित संस्था ‘उज्जैन लघुकथा मंच’ द्वारा भारतीय ज्ञानपीठ में प्रेमचंद पुण्य स्मरण दिवस के अवसर पर प्रथम आयोजन किया गया। कार्यक्रम में सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलानुशासक एवं ख्यात समालोचक डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने कहा कि लघुकथा सुलाने की नहीं, जगाने की विधा है। आज लघुकथा साहित्याकाश में उच्च स्थान पर है। ऐसे में ‘उज्जैन लघुकथा मंच’ का गठन उज्जैन के लघुकथा जगत में नई आशा है। प्रेमचंद का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने अपने समय में उपभोक्ता के दर्द को पहचाना था और उपभोक्ता विमर्श पर लघु रचनाएं लिखी थीं। उन्होंने प्रेमचंद की दो लघुकथाओं ‘कश्मीरी सेब’ और ‘देवी’ का पाठ भी किया। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद का साहित्य इसलिए कालजयी है, क्योंकि उन्होंने समाज की सूक्ष्म पड़ताल की और अपनी कहानियों के माध्यम से लैंगिक भेदभाव, गरीबी तथा सामाजिक पाखंड जैसे विषयों को उजागर किया।
संस्था के डॉ. हरीश कुमार सिंह ने बताया कि कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ लघुकथाकार डॉ. प्रभाकर शर्मा ने की। उन्होंने अपने उद्बोधन में उज्जैन के समृद्ध लघुकथा इतिहास की चर्चा की। प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक तथा लघुकथा मंच के संरक्षक मुकेश जोशी ने संस्था के गठन पर शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम का संचालन मंच के संयोजक सन्तोष सुपेकर ने किया। चेन्नई से प्रोफेसर बी. एल. आच्छा ने अपने संदेश में कहा कि ‘उज्जैन लघुकथा मंच’ लघुकथा के क्षेत्रीय भूगोल का राष्ट्रीय संस्कार है और उसकी आरंभिक सक्रियता आश्वस्त करती है। लघुकथा आज सृजन के केंद्र में है। चेन्नई में रहकर भी उज्जैन की हलचल समुद्री लहर की तरह स्पंदित कर जाती है।
इस अवसर पर नगर के लघुकथाकार मानसिंह ‘शरद’, डॉ. क्षमा सिसौदिया, डॉ. रूपा भावसार, रामचन्द्र धर्मदासानी, आशागंगा शिरढ़ोणकर, डॉ. नेत्रा रावणकर, डॉ. वंदना गुप्ता, माया बदेका, जी. के. निगम, डॉ. संजय नागर, राजेन्द्र नागर ‘निरन्तर’, स्वामीनाथ पांडे, वंदना नागर, डॉ. चित्रा जैन तथा दिलीप जैन ने अपनी लघुकथाओं का पाठ किया। पठन-पाठन को बढ़ावा देने के लिए सदस्यों को पुस्तक समीक्षा हेतु विभिन्न लेखकों के लघुकथा संग्रह भी भेंट किए गए। प्रारंभ में जी. के. निगम ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की। अतिथियों का स्वागत प्रदीप ‘सरल’ तथा अजय सूर्यवंशी ने किया। आभार मानसिंह ‘शरद’ ने माना।


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