रामकथा लोक की सभी बोलियों, भाषाओं को समृद्ध करती है - डॉ. राजेश श्रीवास्तव
‘हिंदी के विकास में रामकथा की भूमिका’ विषय पर ऑनलाइन राजभाषा पखवाड़े के तेरहवें दिन आयोजन
भोपाल। “रामकथा लोक की सभी बोलियों और भाषाओं को समृद्ध करती है। रामकथा रामलीला से चलकर राम कथावाचकों के साथ ही दृश्य-श्रव्य के रेडियो, टी.वी., फिल्म आदि के माध्यम से जन-जन तक पहुंची है। तो निश्चित ही तुलसीदास और रामचरितमानस के भारतीय भाषाओं, खासकर हिंदी के विकास हेतु हमारा समाज सदैव ऋणी रहेगा।”
यह उद्गार प्रोफेसर राजेश श्रीवास्तव, निदेशक, रामायण केंद्र, भोपाल के हैं। वे लघुकथा शोध केंद्र समिति, भोपाल द्वारा आयोजित ऑनलाइन राजभाषा पखवाड़े के तेरहवें दिन ‘हिंदी के विकास में रामकथा की भूमिका’ विषय पर मुख्य वक्ता के रूप में बोल रहे थे।
कार्यक्रम के आरंभ में केंद्र की ओर से वरिष्ठ साहित्यकार ज्योति करंजगांवकर ने स्वागत उद्बोधन दिया। तत्पश्चात डॉ. ममता माली, मुंबई एवं चित्रा राघव राणा, यूएसए के कुशल संचालन में कार्यक्रम के दूसरे वक्ता डॉ. अर्पण अविचल जैन, वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार एवं अध्यक्ष, मातृभाषा उन्नयन संस्थान, इंदौर ने ‘हिंदी बोलने में संकोच क्यों’ विषय पर बोलते हुए कहा कि, “हिंदी का विरोध केवल राजनीति के लिए होता है। हमें अपनी भाषाओं पर गर्व होना चाहिए। कोई भी भाषा सीखना बुरा नहीं, परंतु अपनी भाषा को विस्मृत करना अपनी संस्कृति और अपनी पहचान खो देना है।”
कार्यक्रम के अंत में केंद्र की सदस्य एवं लघुकथाकार मेघा मैथिल ने आभार प्रकट किया। इस महत्वपूर्ण आयोजन में देश-दुनिया के अनेक महत्वपूर्ण साहित्यकार और हिंदी भाषा प्रेमी उपस्थित थे।


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