ओ भूले बिसरे नायक, तुम्हें शत शत नमन
कुछ ऐसे नाम किताबों में बहुत कम आए
उन के हिस्से की दुआओं में भी ख़म आए
दशकों से हम सब अपने दादा -नाना से आज़ादी के मतवालों की कहानियां सुनते आ रहे हैं । वो कहानियां जो बताती हैं कि कितने संघर्ष, कितनी यातनाओं और कितनी क़ुर्बानियों के बाद हमें अपने ही देश में इंसानों की तरह रहने -घूमने, काम करने, पढ़ने -लिखने और बोलने की स्वतंत्रता मिली है। देखा तो नहीं है पर जितना सुना गया है , वो हमारे शूरवीरों, शहीदों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के सामने हमें बार -बार नत मस्तक कर देता है।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल गांधी, नेहरू, सुभाष चंद्र बोस या भगत सिंह तक सीमित नहीं है। हजारों ऐसे स्त्री-पुरुष थे , जिन्होंने इस आंदोलन में जेल की यातनाएं सही, निर्वासन झेला , आर्थिक कठिनाइयाँ और अपने जीवन तक का बलिदान कर दिया लेकिन आज उनकी चर्चा अपेक्षाकृत कम होती है। इन नायकों को आज याद करना क्यों जरूरी है?
इन लोगों को याद करना केवल इतिहास की जानकारी बढ़ाना नहीं है। इनके संघर्ष से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि स्वतंत्रता किसी एक नेता या एक आंदोलन की देन नहीं थी। यहां किसी ने कलम उठाई, किसी ने तिरंगा, किसी ने जंगलों में संघर्ष किया, किसी ने लोगों को इकट्ठा किया , जनजागरण का काम किया और किसी ने ऐसे आज़ादी के दीवानों को बचाते हुए अपना जीवन दे दिया।
आज के संदर्भ में उन कम लोकप्रिय, कम चर्चित या कुछ कम सुने नायकों को याद करना इसलिए भी ज़रूरी है कि देश के भविष्य हमारे युवा और हम स्वयं यह हमेशा याद रखें कि आज़ादी केवल प्राप्त करने की चीज नहीं है। उसे लोकतांत्रिक मूल्यों, न्याय, समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव के माध्यम से लगातार सार्थक बनाए रखना होगा और ये हम सबकी सांझी ज़िम्मेदारी है। इतिहास में किसी नायक की स्मृति कैसे बनती है। जिन सेनानियों का नाम हम अधिकतर सुनते आए हैं। उनमें चंद्रशेखर आज़ाद, महात्मा गांधी और सुभाष चन्द्र बोस आदि प्रमुख नाम हैं। इनकी लोकप्रियता के पीछे कई ऐतिहासिक कारण थे।
उनका संघर्ष अखिल भारतीय स्तर पर दिखा...
गांधी का असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन से देश के बहुत बड़े हिस्से जुड़े। सुभाष चंद्र बोस और आज़ाद भी राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष की बड़ी धारा के प्रमुख प्रतीक बन गए। इसके विपरीत, कई सेनानियों का संघर्ष किसी विशेष क्षेत्र, समुदाय या स्थानीय आंदोलन तक ही सीमित रहा। उनका योगदान महत्वपूर्ण था, लेकिन उसकी पहुँच पूरे देश में उतनी नहीं बन पाई। इसलिए भी उनकी चर्चा कम हुई और होते-होते कुछ अनसुनी तक भी पहुंच गई ।
इतिहास में प्रतीक बन जाना
कुछ व्यक्तित्व धीरे-धीरे पूरे आंदोलन के प्रतीक बन गए। गांधी -अहिंसक जनादोलन, सुभाष चंद्र बोस -सशस्त्र संघर्ष और आज़ाद हिंद फ़ौज, चंद्रशेखर आज़ाद - क्रांतिकारी साहस और बलिदान याने जब किसी व्यक्ति का नाम किसी बड़े विचार या आंदोलन का प्रतीक बन जाता है, तो उसकी स्मृति पीढ़ी-दर-पीढ़ी अधिक आसानी से पहुँचती है।
मीडिया और संचार की भूमिका
यह बहुत महत्वपूर्ण कारण है या कहिए कि सबसे महत्वपूर्ण कारण रहा है। स्वतंत्रता आंदोलन के समय भी अख़बार, पत्र-पत्रिकाएँ, भाषण और साहित्य किसी नेता की लोकप्रियता बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते थे। जिन नेताओं के विचार और गतिविधियाँ व्यापक रूप से प्रकाशित हुईं, वे अधिक लोगों तक पहुँचे। उनके फालोवर बढ़े , जनमानस के बीच उन्होंने एक छबि बनाई और उसी छबि , उसी विचारधारा ने उन्हें देश का चेहरा बना दिया। आज हम इसे सोशल मीडिया के संदर्भ में आसानी से समझ सकते हैं—जिसकी कहानी ज़्यादा लोगों तक पहुँचती है, उसकी सार्वजनिक स्मृति भी अधिक मज़बूत होती है।
स्वतंत्रता के बाद की राजनीति और पाठ्यक्रम
आज़ादी के बाद इतिहास को व्यवस्थित रूप से लिखने और पढ़ाने की प्रक्रिया शुरू हुई। स्वाभाविक रूप से कुछ बड़े राष्ट्रीय आंदोलनों और प्रमुख नेताओं को अधिक स्थान मिला। इसका यह अर्थ नहीं कि बाकी सेनानी कम महत्वपूर्ण थे। हुआ ये कि कई बार क्षेत्रीय इतिहास, आदिवासी आंदोलनों, महिलाओं के योगदान और स्थानीय प्रतिरोधों को राष्ट्रीय इतिहास की तुलना में उतनी जगह नहीं मिली।
कुछ सेनानियों का दस्तावेज़ीकरण कम हुआ
यह भी एक बड़ा कारण है, क्योंकि कई स्थानीय सेनानियों के संघर्ष का रिकॉर्ड अख़बारों, सरकारी दस्तावेज़ों या पुस्तकों में बहुत कम बचा। कुछ आंदोलन मौखिक परंपराओं में जीवित रहे। परिणाम यह हुआ कि अगली पीढ़ियों तक उनकी कहानी उतनी पुख़्तगी के साथ नहीं पहुँच सकी और जैसे कहानियां सुनाने के क्रम में हम से अक्सर कुछ प्रसंग इधर -उधर जाते हैं, हमारे ये सेनानी भी इसी भूल-चूक का हिस्सा हो गये।
लोकप्रियता और योगदान एक ही चीज नहीं हैं
फिर यह भी समझना होगा कि लोकप्रियता और उस व्यक्ति विशेष का योगदान भी कई बार एक नहीं होता । सीधे शब्दों में कहें तो किसी व्यक्ति की लोकप्रियता उसके योगदान का सटीक पैमाना नहीं होती। उदाहरण के लिए अगर कोई नेता बहुत अच्छा बोलने या दिखने की वजह से या फिर अपनी वाक शैली की वजह से लोकप्रिय है तो उस नेता की लोकप्रियता को केवल प्रचार का परिणाम कहना भी ऐतिहासिक रूप से उचित नहीं होगा। वास्तव में हमें यह जानने - समझने की ज़रूरत होगी कि स्वतंत्रता आंदोलन को अगर हम केवल कुछ महान नेताओं की कहानी बना देते हैं तो हम उस आंदोलन की असली व्यापकता खो देते हैं।
असल में स्वतंत्रता की लड़ाई में
एक प्रसिद्ध नेता से लेकर क्रांतिकारी, पत्रकार , किसान , मज़दूर , विद्यार्थी , विदुषी महिलाओं , आदिवासी समुदाय और स्थानीय कार्यकर्ताओं तक सभी की भूमिका थी। इसलिए आज भूले-बिसरे नायकों को याद करना किसी प्रसिद्ध नेता की महत्ता कम करना नहीं है। बल्कि यह भारत के स्वतंत्रता संग्राम की पूरी तस्वीर को सामने लाना है। वर्ना पूछा तो यह भी जाएगा कि क्या इतिहास केवल उन लोगों का होता है जिनके नाम सबसे ज्यादा याद रखे गए, या उन लाखों लोगों का भी, जिनके योगदान ने आज़ादी की नींव मज़बूत की लेकिन जिनके नाम समय की धूल में दब गए? यह सवाल आज के युवाओं और लोकतंत्र के संदर्भ में भी बहुत प्रासंगिक है। यहाँ कुछ ऐसे भूले-बिसरे या कम चर्चित स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में संक्षिप्त में जानें-
गणेश शंकर विद्यार्थी
एक पत्रकार, समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी। उन्होंने प्रताप अख़बार के माध्यम से ब्रिटिश शासन की नीतियों के विरुद्ध जनमत तैयार किया। उन्होंने ब्रिटिश शासन के अत्याचारों, किसानों और मजदूरों के शोषण के ख़िलाफ़ निडरता से आवाज़ उठाई। आपने पत्र 'प्रताप' के जरिए उन्होंने शोषित जनता, किसानों और मिल मज़दूरों के अधिकारों की पुरज़ोर वकालत की। उन्हें किसान 'प्रताप बाबा' कहकर पुकारते थे। उन्होंने होम रूल आंदोलन, असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया, जिसके लिए उन्हें कई बार कठोर कारावास की सजा भुगतनी पड़ी। मार्च 1931 में कानपुर में भयंकर सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना दंगों के बीच जाकर फंसे हुए सैकड़ों बेकसूर लोगों की जान बचाई। 25 मार्च 1931 को इसी मानवीय कार्य के दौरान हिंसक भीड़ ने उनकी निर्मम हत्या कर दी। उन्होंने देश और भाईचारे के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए अपनी कलम को हथियार बनाया और ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। वे केवल पत्रकार नहीं थे, बल्कि सामाजिक सद्भाव के प्रबल समर्थक थे। 25 मार्च 1931 को कानपुर में सांप्रदायिक दंगों के दौरान हिंदू-मुस्लिमों की जान बचाते हुए वे हिंसक भीड़ का शिकार हो गए थे ।
मातंगिनी हाजरा
बंगाल की मातंगिनी हाजरा को प्यार से “गांधी बुढ़ी” कहा जाता था। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान वे तिरंगा लेकर आगे बढ़ रही थीं। गोली लगने के बावजूद वे राष्ट्रीय ध्वज को थामे रहीं। वे इस बात का उदाहरण हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं और ग्रामीण समाज की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण रही । उन्होंने गांधीजी के विचारों और अहिंसा के मार्ग पर चलते हुए आजीवन देश की सेवा की ।
उषा मेहता
उषा मेहता, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय 22 वर्षीय क़ानून की छात्रा थीं। वो गांधी की विचारधारा से प्रभावित हुईं और उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़कर आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया। सूचना के प्रचार-प्रसार की प्रभावकारिता को पहचानते हुए उन्होंने संचार के एक गुप्त साधन के रूप में कॉन्ग्रेस रेडियो की धारणा की कल्पना की।गुप्त कांग्रेस रेडियो चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ब्रिटिश सरकार द्वारा सेंसरशिप के बावजूद इस रेडियो के माध्यम से आंदोलनकारियों तक समाचार और संदेश पहुँचाए जाते थे। उषा मेहता की कहानी , उनका योगदान आज के मीडिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संदर्भ में विशेष रूप से प्रासंगिक है।
पीर अली खान
अनसुने नायकों में पीर अली खान का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वे पटना में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़े थे। गिरफ्तार किए जाने के बाद उन्हें फ़ांसी दे दी गई थी। पीर अली खान का जीवन बताता है कि 1857 का विद्रोह केवल कुछ प्रसिद्ध सैनिक नेताओं तक सीमित नहीं था। पीर अली खान का ख़ौफ़ ऐसा था कि उनके अंदर से निकलने वाली आज़ादी की चिंगारी अंग्रेज़ों को डराने के लिए काफी थी।
अल्लूरी सीताराम राजू
आंध्र प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में इन्होंने ब्रिटिश शासन की नीतियों के ख़िलाफ़ रम्पा विद्रोह का नेतृत्व किया। उनका संघर्ष मुख्यतः आदिवासी समुदायों के अधिकारों और औपनिवेशिक दमन के विरुद्ध था। दक्षिण भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन्होंने लोगों को जागरूक कर संगठित आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अल्लूरी सीताराम राजू एक महान भारतीय क्रांतिकारी थे। वे मुख्य रूप से अंग्रेज़ों के दमनकारी वन क़ानूनों के ख़िलाफ़ आदिवासियों को एकजुट करके गुरिल्ला युद्ध चलाने के लिए प्रसिद्ध थे। स्थानीय लोगों के बीच वो जंगल के नायक के रूप में प्रसिद्ध रहे।
कनकलता बरुआ
असम की युवा स्वतंत्रता सेनानी कनकलता बरुआ भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय थीं। कनकलता बरुआ भारत की वो स्वतन्त्रता सेनानी थीं, जिनको अंग्रेज़ों ने 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन के समय गोली मार दी। उन्हें 'बीरबाला' भी कहते हैं। वे असम की निवासी थीं। उन्हें पूर्वोत्तर भारत की 'लक्ष्मीबाई' भी कहा जाता हैं। 1942 में वे तिरंगा लेकर एक जुलूस का नेतृत्व कर रही थीं। वे पूर्वोत्तर भारत में युवाओं की स्वतंत्रता संघर्ष में भागीदारी का प्रतीक हैं। तिरंगा हमारी आन बान शान का प्रतीक है। ऐसी क़ुर्बानियां क्या कभी भुलाई जा सकेंगी?
तिरुप्पुर कुमारन
तमिलनाडु के युवा स्वतंत्रता सेनानी तिरुप्पुर कुमारन ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलनों में हिस्सा लिया। वे राष्ट्रीय ध्वज को लेकर निकले जुलूस के दौरान पुलिस की कार्रवाई में घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। उन्हें तमिलनाडु में “कोडी काथा कुमारन” याने “झंडे की रक्षा करने वाले कुमारन” के नाम से याद किया जाता है।
रानी गैदिनल्यू
पूर्वोत्तर भारत की रानी गैदिनल्यू ने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलन किया। बहुत कम उम्र में वे इस संघर्ष से जुड़ीं और उन्हें लंबे समय तक जेल में रहना पड़ा। उनका योगदान यह याद दिलाता है कि स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी पूर्वोत्तर भारत के जनजातीय समाजों को शामिल किए बिना अधूरी है। समाज सेवा के क्षेत्र में उनके कार्यों के लिए भारत सरकार ने उन्हें 1982 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।
संगीता 'सुमन'



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