साहित्य में एक नई जमीन तोड़ता है उपन्यास ‘ढाई इंच पर दौड़ती जिंदगी’- प्रो. शर्मा
उज्जैन। “उपन्यास ‘ढाई इंच पर दौड़ती जिंदगी’ मनुष्य जीवन के यंत्रवत हो जाने की त्रासदी का सजीव चित्रण है। भारतीय रेल केवल परिवहन नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज है। लेखक ने रेलकर्मियों, विशेषकर लोको पायलटों के कठिन जीवन, अंतर्बाह्य संघर्ष और पीड़ा को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है। यह उपन्यास हिंदी कथा साहित्य में एक नई जमीन तोड़ता है, क्योंकि आम आदमी और किसान पर तो बहुत लिखा गया है, लेकिन लोको पायलट के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संघर्ष पर केंद्रित यह एक दुर्लभ कार्य है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रामाणिकता है।” यह विचार प्रेमचंद सृजन पीठ उज्जैन एवं सरल काव्यांजलि के संयुक्त तत्वावधान में प्रेस क्लब में आयोजित लेखक संतोष सुपेकर के उपन्यास ‘ढाई इंच पर दौड़ती जिंदगी’ के विमोचन समारोह में सारस्वत अतिथि, समालोचक एवं सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने व्यक्त किए।
प्रमुख अतिथि एवं सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय कार्यपरिषद के वरिष्ठ सदस्य राजेश सिंह कुशवाह ने कहा कि यह उपन्यास लोको पायलट की कठिन सेवा तथा उनके कार्यकाल के रोमांचकारी और विचित्र अनुभवों का निचोड़ है। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध मालवी कवि डॉ. शिव चौरसिया ने की। उन्होंने कहा कि सुपेकर ने रेल की जिंदगी में डूबकर अपने अनुभवों को शब्दों में ढालते हुए उन्हें उपन्यास में बखूबी व्यक्त किया है। विशेष अतिथि सुप्रसिद्ध कथाकार मनीष वैद्य (देवास) ने कहा कि उपन्यास एक बड़ी विधा है और उसे साधना कठिन होता है, लेकिन सुपेकर इस कसौटी पर खरे उतरे हैं। उन्होंने एक अनछुए विषय पर प्रभावशाली उपन्यास की रचना की है। विशेष अतिथि मनीष शर्मा (देवास) ने कहा कि रेल का आकर्षण हमारे अवचेतन में रहता है, लेकिन सुपेकर ने इस उपन्यास के माध्यम से रेल का दूसरा पक्ष सामने रखा है।
स्वागत भाषण देते हुए प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी ने कहा कि लघुकथाकार के रूप में विख्यात संतोष सुपेकर अब उपन्यास लेखन के लिए भी जाने जाएंगे। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती एवं प्रेमचंद के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। सरस्वती वंदना डॉ. राजेश रावल ने प्रस्तुत की। अतिथि स्वागत सरल काव्यांजलि के अध्यक्ष डॉ. संजय नागर, दिनेश दिग्गज, मानसिंह शरद, रमेश जाजू, संतोष सुपेकर, राजेन्द्र नागर, डॉ. पुष्पा चौरसिया, संदीप नागर, हर्ष सैनी, अनिल चौबे एवं नितिन पोल ने किया।
आयोजन में प्रख्यात साहित्यकार एवं दूरदर्शन के पूर्व महानिदेशक राजशेखर व्यास, डॉ. जगदीश शर्मा, डॉ. विश्वामित्र राय, डॉ. उर्मि शर्मा, डॉ. प्रीति जोशी, डॉ. रश्मि मोयदे, डॉ. पांखुरी वक्त, संदीप सृजन, डॉ. स्वामीनाथ पांडेय, डॉ. वंदना गुप्ता, आशागंगा शिरढोणकर, राजेश ठाकुर, आशीष ‘अश्क’, देवास के कहानीकार हिमांशु कुमावत, वी.एस. गहलोत, डॉ. नेत्रा रावणकर, सुगनचंद जैन, डॉ. संगीता कारलेकर, डॉ. मोहन बैरागी, अशोक रावणकर, एम.जी. सुपेकर, भूषण जी एवं अनिल पांचाल सहित अनेक साहित्यकार उपस्थित रहे। अतिथियों को स्मृति-चिह्न संतोष सुपेकर एवं राजेन्द्र देवधरे ‘दर्पण’ ने प्रदान किए।
कार्यक्रम का संचालन मध्यप्रदेश लेखक संघ के सचिव डॉ. हरिशकुमार सिंह ने किया तथा आभार नितिन पोल ने व्यक्त किया। समारोह में उपस्थित साहित्यकारों ने संतोष सुपेकर के उपन्यास को हिंदी कथा साहित्य में एक नए और अनछुए विषय को केंद्र में लाने वाली महत्वपूर्ण कृति बताते हुए इसकी सराहना की।




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