म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र के सम्मान में काव्य गोष्ठी आयोजित


गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र के सम्मान में काव्य गोष्ठी आयोजित

भोपाल। देहरादून से पधारे शीर्षस्थ गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र के सम्मान में वरिष्ठ गीतकार एवं ‘पहला अंतरा’ के प्रधान संपादक नरेन्द्र दीपक के अरेरा कॉलोनी स्थित आवास पर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भोपाल के अनेक वरिष्ठ एवं चर्चित रचनाकारों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। गोष्ठी का शुभारंभ वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामवल्लभ आचार्य ने अपने प्रसिद्ध गीत की पंक्तियों—“मन में इतनी उलझन, जितने सघन सतपुड़ा वाले वन, हल्दी घाटी हुई ज़िंदगी, चेरापूंजी हुए नयन”—से किया। इसके बाद डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र की पौत्री एवं गीतकार संस्कृति मिश्र ने “मेरा तुमसे रिश्ता वैसा, जैसा साँसों का धड़कन से” गीत प्रस्तुत किया। चर्चित नवगीतकार एवं ‘वागर्थ’ समूह के संस्थापक मनोज जैन ‘मधुर’ ने अपना लोकप्रिय प्रेमगीत “आज किसी से मिलकर यह मन जी भर बतियाया, लगा कि जैसे हमने अपने ईश्वर को पाया” सुनाया, जिसे खूब सराहना मिली। म.प्र. लेखक संघ के अध्यक्ष एवं ख्यात व्यंग्यकार राजेन्द्र गट्टानी ने व्यंग्य रचनाओं, क्षणिकाओं और मुक्तकों से वातावरण में हास्य का रंग भर दिया।

वरिष्ठ कवि, चिंतक, विचारक एवं मुक्तिबोध पीठ के निदेशक डॉ. ऋषि कुमार मिश्र ने जीवन-चक्र पर आधारित रचना प्रस्तुत करते हुए कहा—“सूखे पत्ते गिरने, नए निकलने में कुछ तो समय लगेगा।” गीतकार ऋषि श्रृंगारी ने अपने मधुर कंठ से “केवल उपक्रम भर हैं साँसें, गीत मुझे ज़िंदा रखते हैं” सुनाकर वातावरण को गीतमय कर दिया। देश के चर्चित गीतकार नरेन्द्र दीपक ने अपने चुनिंदा शेरों से गोष्ठी में रस परिवर्तन किया। उनके शेर—“साँसों से ज़िंदगी का ठीक अंदाज़ा नहीं होता, बहुत दिन जी लेते हैं मरे हुए लोग” तथा “जिधर से भी देखा साबुत लगा, किस करीने से टूटा है कोई”—को खूब सराहना मिली। ग़ज़लकार सुरेश पबरा ‘आकाश’ ने व्यक्ति की प्रवृत्ति पर कटाक्ष करती ग़ज़ल प्रस्तुत की—“मेरे भीतर और कुछ है, मेरे बाहर और कुछ, कहना मुझको और कुछ, कह रहा पर और कुछ।” व्यंग्य कवि एवं पैरोडीकार सुनील चतुर्वेदी ने व्यंग्य क्षणिका के साथ पैरोडी प्रस्तुत कर उपस्थित रचनाकारों को ठहाके लगाने पर विवश कर दिया। उन्होंने अपने साहित्यकार पिता स्वर्गीय बटुक चतुर्वेदी को समर्पित रचना भी सुनाई, जिसे भरपूर सराहना मिली।

कवि गणेश शंकर मिश्र ने गंभीर भावबोध से युक्त समकालीन कविता प्रस्तुत की। प्रसिद्ध कवयित्री डॉ. मधु शुक्ला ने वर्षा ऋतु में पंछियों के नदी-झीलों के तट पर लौटने का शब्दचित्र उकेरते हुए कहा—“लौट आए हैं शरद पांखी, तटों पर फिर नदी झीलों पर।” निराला सृजन पीठ की निदेशक तथा व्यंग्यकार-गीतकार डॉ. साधना बलवटे ने मधुर स्वर में गीत प्रस्तुत किया—“आ भी जाओ, क्यों भटकते हो यूँ ही दर-दर।” इसके बाद मुख्य अतिथि डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने कई मुक्तक और गीत सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। उनका मुक्तक—“दर्द की मीठी थाप पर मरता, आँसूओं के मिलाप पर मरता, ऐसा लगता है मैं मरूँगा नहीं, मरना होता तो आप पर मरता”—विशेष रूप से सराहा गया। उनके पावस गीत “प्यास हरे कोई घन बरसे, तुम बरसो या सावन बरसे” ने भी खूब वाहवाही बटोरी।

रचनाकारों के विशेष अनुरोध पर डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने अपना देशभर में लोकप्रिय गीत “एक बार और जाल फेंक रे मछेरे, जाने किस मछली में बंधन की चाह हो” भी सुनाया। उनकी प्रस्तुति के दौरान पूरा वातावरण साहित्यिक भाव और गीत की संवेदना से भर उठा। उपस्थित सभी साहित्यकारों ने डॉ. मिश्र की रचनाओं और गायन की मुक्तकंठ से प्रशंसा की। कार्यक्रम के अंत में मेजबान एवं वरिष्ठ गीतकार नरेन्द्र दीपक ने सभी अतिथियों और रचनाकारों के प्रति आभार व्यक्त किया।

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