मानसून की रिमझिम फुहारों के बीच जब गूंजे मोहब्बत के तराने
उज्जैन। जुलाई का महीना, मानसून की मनभावन शाम और कालिदास अकादमी के अभिरंग नाट्य गृह का मुग्ध कर देने वाला माहौल! कल भारतीय जीवन बीमा निगम के अभिकर्ताओं, कर्मचारियों और अधिकारियों की संस्था 'जीवन संगीत' ने एक ऐसी सुरीली और रूमानी शाम सजाई, जिसने श्रोताओं को सुनहरी यादों और खूबसूरत एहसासों से सराबोर कर दिया।
माँ वाग्देवी के चित्र पर दीप प्रज्वलन के साथ शुरू हुई इस महफ़िल में साहित्य, भाव और सुरों की ऐसी त्रिवेणी बही कि उम्र के हर पड़ाव पर खड़ा व्यक्ति बस संगीत के इसी सागर में डूब जाना चाहता था। कार्यक्रम में वरिष्ठ रंगकर्मी श्री नितिन सेठिया जी को 'जीवन संगीत कला सम्मान' से अलंकृत कर कला के प्रति गहरा सम्मान प्रकट किया गया। संगीत की इस महफ़िल में उज्जैन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष श्री विजय अग्रवाल, प्रो. हरिमोहन बुधौलिया, डॉ. शिव चौरसिया, श्री शैलेष लेले (फिल्मी गीत समीक्षक), लायन श्री बी.के. खंडेलवाल और बालीवुड गायक सुनील बावनिया जी बतौर अतिथि साक्षी बने।
जुलाई की इस खुशनुमा और रिमझिम फुहारों वाली शाम में जब कालिदास अकादमी के अभिरंग नाट्य गृह में संगीत के सुर घुले, तो पूरा माहौल मानो किसी रूमानी ख्वाब सा सज गया। गीतों का सफर कुछ इस कदर शुरू हुआ कि हर श्रोता अपनी पुरानी यादों के सुनहरे पन्नों में खो गया। शाम की शुरुआत नयनों और जुल्फों की नज़ाकत से हुई। सुनीता राठौर (गुंजन) ने जब अपनी मखमली आवाज़ में "ये दिल और उनकी निगाहों के साये" छेड़ा, तो पूरा हॉल तालियों से गूंज उठा। इसी खुमार को और गहरा करते हुए विनोद मातवणकर ने "तुम्हारी जुल्फ के साये में" और "आने से उसके आए बहार" गाकर फिजा में रूमानियत घोल दी। वहीं, सुरेन्द्र मालवीय ने "मुझे ईश्क है तुझी से" और "ये रेशमी जुल्फें" के जरिये प्यार के इज़हार को बेहद खूबसूरती से मंच पर उतारा।
मोहब्बत में थोड़े इंतज़ार और थोड़ी बेकरारी का भी अपना एक अलग ही मज़ा है। योगेश यादव ने जब दर्द और कशिश भरे अंदाज़ में "दिल बेकरार सा है" और "हाय तबस्सुम तेरा" गाया, तो श्रोताओं के दिलों की धड़कनें मानो थम सी गईं। इसी कड़ी में प्रशांत सोहले ने "तुम दिल की धड़कन में रहते हो" और विजय जोशी ने "सिमटी सी, शरमाई सी" की प्रस्तुति देकर भावनाओं को एक बेहद गहरा और मर्मस्पर्शी स्पर्श दिया। महफ़िल में थोड़ी शोखी और चुलबुलापन लाते हुए संतोष जोशी ने "माना जनाब ने पुकारा नहीं" और "पुकारता चला हूँ मैं" से सभी को झूमने पर मजबूर कर दिया। जवां दिलों की धड़कन बढ़ाते हुए प्रकाश बांगर ने "सारा जमाना" और रवि चौबे ने "गुलाबी आंखें जो तेरी देखी" की ऊर्जावान और फुट-टैपिंग प्रस्तुति से पूरे माहौल में एक नया जोश भर दिया।
रोमांटिक गानों की असली जान तो युगल गीतो की जुगलबंदी में बसती है। भालचंद्र कुलकर्णी और भारती कुलकर्णी (कुलकर्णी दम्पति) ने जब एक-दूजे के साथ "मुझे कितना प्यार है तुमसे" और "ऐसी दीवानगी देखी नहीं कहीं" गाया, तो सच्चा और सदाबहार प्रेम मंच पर जीवंत हो उठा। इस पूरी शाम में पूर्णिमा नाटानी जी ने अपनी जादुई आवाज़ से कई गायकों का बखूबी साथ निभाया; उन्होंने प्रकाश बांगर के साथ "तुझ संग प्रीत लगाई सजना", विजय जोशी के साथ "हम तुमसे मिले, फिर जुदा हो गए" और रवि चौबे के साथ "ऐ मेरे हमसफर" गाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। और फिर जुलाई के इस शानदार मौसम का असली मज़ा तो तब आया, जब प्रशांत सोहले और पूर्णिमा नाटानी ने मिलकर "रिमझिम-रिमझिम रुमझुम-रुमझुम" छेड़ा; ऐसा लगा मानो बाहर बरस रही सावन की बूंदें सीधे ऑडिटोरियम के भीतर सुरों के रूप में बरस रही हों।
गीतों के इस सुहाने सफर में सूत्रधार मनोज सुराना जी के सुमधुर संचालन ने मानो शब्दों के जादू से श्रोताओं का दिल जीत लिया। एक के बाद एक पिरोए गए इन सदाबहार तरानों ने वाकई एक ऐसा समां बांधा कि कार्यक्रम के खत्म होने के बाद भी वो धुनें, वो मीठे एहसास और वो सुरीली शाम हर किसी के जहन में देर तक गूंजती रही।
इस संगीतमय आयोजन में शहर के कई गणमान्य नागरिक और कला-प्रेमी रसिक श्रोता बनकर उपस्थित रहे। जिनमें प्रमुख रूप से प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी, फिल्म समीक्षक शशांक दुबे, लियाफी के बाबूलाल मूंदड़ा, अष्टविनायक मंदिर के संस्थापक हेमंत व्यास, राजेन्द्र नागर, यू.एस. छाबड़ा, प्रसिद्ध कलाकार जयेंद्र रावल, गौरीशंकर दुबे, संदीप सृजन और अनूप बोरलिया सहित बड़ी संख्या में श्रोताओं ने अपनी उपस्थिति से कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।
अंत में संस्था के कोषाध्यक्ष विजय जोशी जी ने सभी अतिथियों और कला-प्रेमियों का हृदय से आभार व्यक्त किया। अध्यक्ष श्री अनिल कुरेल जी और पूरी आयोजन समिति डॉ. हरीशकुमार सिंह, सुभाष पाठक, अमित मिश्रा, रतन रायकवार, कमल पंथी, बी.डी. बैरागी, गजानंद जांगड़े और सभी साथियों की इस मेहनत ने सिद्ध कर दिया कि संगीत सिर्फ धुन नहीं, बल्कि वो सुकून है जो जिंदगी की आपाधापी के बीच हमें खुद से मिलाता है। सच ही है, संगीत उम्र के हर पड़ाव पर रूह को जवां रखता है।




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