Subscribe Us

चिंगारी


धधकती आग में दबी बैठी हूँ मैं
छेड़ो ना मुझे और ना उकसाओ
एक गलती पड़ेगी बड़ी महंगी
दहकती आग को और ना दहकाओ...

राख हो जाने तक मैं सबर कर लूँगी
कर लो सितम चाहे जितने कर लो
राख हो सकती भले एक बार वो ठण्डी
प्रतिशोध की ज्वाला को अब ना भभकाओ..

हक मेरा छीनते रहे हो सदा
सदियों वंचित ही रखा है मुझको
दर्जा दोयम ही देते रहे मुझ-सो को
कौम मेरी अब ना सहेगी तुम जैसे गुनाहगारों को..

बेड़ियों के बंध अब और नहीं
ना सहूँगी अब तुम्हारे तानों को
मैं हूँ राख के ढेर में दबी वो चिंगारी
जला के खाक कर दूँगी 'कास्टिज्म के सिस्टम' को....

-रामदास 'समर्थ', उज्जैन (म.प्र.)

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ