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समुद्र की बूँद की तरह सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करती है लघुकथा - डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा

समुद्र की बूँद की तरह सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करती है लघुकथा - डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा
प्रेमचंद सृजन पीठ एवं सरल काव्यांजलि द्वारा ‘समकालीन लघुकथा और आज का परिदृश्य’ विषय पर विमर्श एवं लघुकथा-पाठ का सफल आयोजन


उज्जैन। वर्तमान समय में हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं में लघुकथा अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करा रही है। कम शब्दों में गहन संवेदना, सामाजिक यथार्थ तथा सशक्त संदेश प्रस्तुत करने की क्षमता के कारण लघुकथा समकालीन साहित्य की एक महत्वपूर्ण विधा बनकर उभरी है। बदलती जीवनशैली, समयाभाव और डिजिटल माध्यमों के बढ़ते प्रभाव ने इसे पाठकों के बीच और अधिक लोकप्रिय बनाया है।

ये विचार प्रेमचंद सृजन पीठ एवं सरल काव्यांजलि साहित्यिक संस्था द्वारा भारतीय ज्ञानपीठ महाविद्यालय में आयोजित ‘समकालीन लघुकथा और आज का परिदृश्य’ विषयक विमर्श में मुख्य वक्ता एवं लघुकथा-जगत के प्रख्यात हस्ताक्षर डॉ. ध्रुव कुमार (पटना) ने व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि आज की लघुकथाएँ सामाजिक विसंगतियों, पारिवारिक संबंधों, तकनीकी प्रभाव, राजनीतिक परिस्थितियों, स्त्री-विमर्श, पर्यावरण, अकेलेपन तथा बदलते मानवीय मूल्यों जैसे विषयों को प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त कर रही हैं। उन्होंने लघुकथा को शैक्षणिक पाठ्यक्रमों में शामिल किए जाने की आवश्यकता पर बल देते हुए वरिष्ठ लघुकथाकार सतीशराज पुष्करणा के योगदान पर भी प्रकाश डाला।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात समालोचक एवं सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलानुशासक डॉ. शैलेन्द्रकुमार शर्मा ने लघुकथा की विकास-यात्रा का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि लघुकथा समुद्र की एक बूँद की तरह सम्पूर्ण समाज का प्रतिनिधित्व करती है। आज स्त्री-विमर्श, दिव्यांग-विमर्श, जनजातीय एवं दलित विमर्श, प्रवासी जीवन सहित कोई भी विषय लघुकथा से अछूता नहीं है। पटना से लेकर उज्जैन और विश्वभर तक इसका व्यापक दायरा है।

उन्होंने कहा कि लघुकथा में प्रतीकात्मकता, सांकेतिकता, शब्दों की सादगी तथा प्रयोगधर्मिता का होना आवश्यक है। यह लेखक, पाठक और आलोचक के बीच सृजनात्मक संवाद का माध्यम है। गहरी प्रतिबद्धता के साथ ‘लघु में विराट’ को देखना ही लघुकथा का मूल स्वरूप है।

विशिष्ट अतिथि एवं ख्यात लघुकथाकार संतोष सुपेकर ने कहा कि लघुकथा के उज्ज्वल भविष्य के लिए रचनाकार को व्यापक विश्व-दृष्टि विकसित करनी होगी। मनुष्य जीवन की वास्तविकताओं, भावनाओं, अंतर्संबंधों, संघर्षों, समझौतों तथा जटिलताओं को नए और सृजनात्मक रूप में अभिव्यक्त करना होगा। उन्होंने कहा कि आत्मचेतस बनने के लिए विश्वचेतस होना आवश्यक है। भूख, शिक्षा, पर्यावरण, लैंगिक समानता, परमाणु हथियार तथा साइबर अपराध जैसे वैश्विक विषयों पर और अधिक रचनात्मक कार्य किए जाने की आवश्यकता है।

विशिष्ट अतिथि एवं प्रख्यात फिल्म समीक्षक शशांक दुबे ने कहा कि समकालीन लघुकथा के विषयों में नवीनता होना आवश्यक है। पाठक को लघुकथा पढ़ते समय उसके अंत का आभास नहीं होना चाहिए तथा उसकी मारकता ऐसी हो कि उसका प्रभाव लंबे समय तक बना रहे।

इस अवसर पर डॉ. ध्रुव कुमार का सम्मान सरल काव्यांजलि के अध्यक्ष डॉ. संजय नागर, सचिव मानसिंह शरद तथा जैन कवि संगम की ओर से अध्यक्ष सुगनचंद जैन, दिलीप जैन, संदीप सृजन एवं अन्य सदस्यों द्वारा किया गया।

कार्यक्रम में शहर के अनेक लघुकथाकारों ने अपनी रचनाओं का प्रभावशाली पाठ किया। इनमें डॉ. वंदना गुप्ता, आशा गंगा, प्रमोद शिरढोनकर, डॉ. हरीशकुमार सिंह, संतोष सुपेकर, मुकेश जोशी, डॉ. प्रभाकर शर्मा, रमेशचन्द्र शर्मा, डॉ. स्वामीनाथ पाण्डेय, मानसिंह शरद, कमलेश व्यास ‘कमल’, संदीप सृजन, डॉ. नेत्रा रावणकर, रमेश मनोहरा (जावरा), राजेन्द्र नागर ‘निरंतर’, सीमा पंड्या, दिलीप जैन, योगेन्द्र माथुर, अनिल पांचाल तथा डॉ. रश्मि मोयदे प्रमुख रहे।

विमर्श में वरिष्ठ साहित्यकार अशोक भाटी, दिनेश दिग्गज, सुरेन्द्र सर्किट, संदीप कुलश्रेष्ठ, डॉ. संजय नागर, प्रफुल्ल शुक्ल, अखिलेश चौरे, पं. लोकेन्द्र शास्त्री तथा गिरिजा देवी ठाकुर सहित अनेक साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

कार्यक्रम का स्वागत भाषण प्रेमचंद सृजन पीठ के अध्यक्ष मुकेश जोशी ने दिया। संचालन डॉ. हरीशकुमार सिंह ने किया तथा आभार प्रदर्शन डॉ. वंदना गुप्ता ने व्यक्त किया।

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