मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा प्रादेशिक हास्य व्यंग्य, गद्य -पद्य गोष्ठी का आयोजन
भोपाल। मध्यप्रदेश लेखक संघ द्वारा प्रादेशिक हास्य व्यंग्य, गद्य -पद्य में गोष्ठी का आयोजन दुष्यन्त कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय, शिवाजी नगर, भोपाल में, वरिष्ठ साहित्यकारों मुकेश वर्मा के मुख्य आतिथ्य, डॉ साधना बलवटे एवं प्रदीप नवीन के सारस्वत आतिथ्य, डॉ रामवल्लभ आचार्य, संरक्षक मध्यप्रदेश लेखक संघ के विशिष्ट आतिथ्य एवं राजेंद्र गट्टानी, अध्यक्ष मध्यप्रदेश लेखक संघ की अध्यक्षता में संपन्न हुई।
गोष्ठी में प्रदेश के चर्चित हास्य-व्यंग्य रस के साहित्यकारों ने अपनी रचनाएँ सुनाई। पहले व्यंग्यकार के रूप में सुधा दुबे ने 'घड़ियाली आंसू' विषय पर गहरा व्यंग्य सुनाया। कैलाश सोनी 'सार्थक' ने हास्य व्यंग्य कुछ यूँ सुनाया "वक़्त ख़राब हो तो कुछ भी हो सकता है"। अशोक व्यास के व्यंग्य "विख्यात संस्था के कुख्यात अध्यक्ष" बहुत सराहा गया। सीमा हरि शर्मा का व्यंग्य "पाठक की खोज, छपना श्रेष्ठता की गारंटो नहीं है" पसन्द किया गया। सुनील चतुर्वेदी की पैरोडी, "मैं हूँ मुन्ने खां भोपाली", ने ख़ूब गुदगुदाया। आलोक जैन ने अपनी क्षणिकाओं से हँसाने के साथ, विचार करने को मजबूर किया, उन्होंने सुनाया, वादों का जनरेटर चालू है"। राज गोस्वामी ने सुनाया, "जीवन में हम राजा बन सके न रंक, व्यस्त रहे मारने में डंक"।
देवास से आई यशोधरा भटनागर का व्यंग्य "भैया कुछ दिन पहले रिटायर हुए हैं" बहुत सराहा गया। देवास के ही सुरेंद्र सिंह 'हमसफ़र' की रचना "हमारे यहाँ सर्प का जहर उतारा जाता है" श्रोताओं को आनंद से भर गयी। वरिष्ठ व्यंग्यकार राजेंद्र चौहान का व्यंग्य "अध्यापक, जल्दी से प्रधानमंत्री का नाम बताओ" छात्र, जल्दी क्या है, ये प्रधानमंत्री पंद्रह साल से पहले नहीं जायेंगे" लोगों को बहुत गुदगुदाया। मंच का सफल संचालन करते हुए संस्था के सचिव मनीष बादल ने कुछ व्यंगात्मक दोहों के साथ दो व्यंग्य से भरी लघुकथाएं "हिट कवि एवं तपस्या में समस्या" सुनाईं। उनका दोहा, " मानव को चुभने लगे, जब ऊँचे क़द नाम। तब गमलों में बो दिये, बरगद पीपल आम। " बहुत पसन्द किया गया। संस्था के संरक्षक एवं विशिष्ट अतिथि डॉ राम वल्लभ आचार्य की रचना, " डरते हो जिससे उस थानेदार पर, गर धौंस जमाना हो तो अख़बार निकालो" को ख़ूब सराहना मिली। कार्यक्रम के सारस्वत अतिथि, प्रदीप नवीन ने सुनाया, "हाथ में हमारे बस फेविकोल था, टूटे हुए रिश्तों को बस जोड़ते रहे" दूसरी सारस्वत अतिथि डॉ साधना बलवटे के व्यंग्य, "दो पेड़ों की बातें" जो स्मार्ट सिटी में काटे गए वृक्षों पर तंज कसती हैं, बहुत सराही गयी। उन्होंने कहा कि "व्यंग्य व्यक्ति विशेष पर नहीं, प्रवृत्ति पर होना चाहिए"।
मुख्य अतिथि मुकेश वर्मा ने चुटिले अंदाज़ में कार्यक्रम की समीक्षा की एवं "धन्यवाद" शब्द के प्रयोग पर करारा व्यंग्य किया। अध्यक्षक्षीय उद्बोधन में संस्था के अध्यक्ष राजेंद्र गट्टानी ने अपने वक्तव्य रखे एवं रचना सुनाई, "मुझे स्कूल से यह कहकर निकाला गया था, तुझे नाटक नहीं आता, करेगा क्या ज़माने में"। स्वागत वक्तव्य संस्था के उपाध्यक्ष ऋषि श्रृंगारी ने दिया एवं धन्यवाद ज्ञापन अशोक धमेनिया ने दिया। कार्यक्रम का सफल संचालन मनीष बादल ने किया।





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