म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

रचनाकारों के लिए विमर्श जैसे आयोजन व्यंग्य चेतना जागृत करते हैं - डॉ. पिलकेंद्र अरोरा

रचनाकारों के लिए विमर्श जैसे आयोजन व्यंग्य चेतना जागृत करते हैं - डॉ. पिलकेंद्र अरोरा

उज्जैन। कविता और कहानी की तरह व्यंग्य में भी नए प्रयोग करना चाहिए। अब बड़े व्यंग्यों के लिए न पत्र -पत्रिकाओं के पास स्पेस है और न पाठकों के पास धैर्य, रचनाकारों के लिए विमर्श एवं व्यंग्य पाठ जैसे आयोजन खुली कार्यशाला जैसे हैं जो व्यंग्य चेतना जागृत करते हैं।

ये विचार प्रेमचंद सृजन पीठ उज्जैन द्वारा साहित्य अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद के तत्वावधान में विक्रमादित्य शोध पीठ में समकालीन व्यंग्य के समक्ष चुनौतियाँ विषय पर प्रथम सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. पिलकेंद्र अरोरा ने व्यक्त किये। अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री शशांक दुबे ने कहा कि आज समाज में नैतिक मूल्य, संस्कृति, मानवीय संवेदनाओं का निरंतर क्षरण हो रहा है, ऐसे में हम यह उम्मीद कैसे करें कि कहानी, कविता, व्यंग्य का क्षरण नहीं होगा। हिंदी साहित्य लिखने पढ़ने सहेजने वाली पीढ़ी धीमे धीमे दृश्य पटल से विदा ले रही है और नई अंग्रेजीदा पीढ़ी सामने आ रही है, जिसकी साहित्य में रुचि कम है।


मुख्य वक्ता के रूप में श्री शांतिलाल जैन ने कहा कि व्यंग्य के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती अगर कोई है तो वो सरोकार के गुम होने की है या उसके छीजते जाने की है। अग्रज व्यंग्यकारों के सम्पूर्ण वांग्मय को देखेंगे तो हम पाते हैं कैसे उन्होंने सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों पर तीखे और बौद्धिक अंदाज़ में प्रहार किए और उन्होंने जन-सरोकार के विषय उठाए। मुख्य वक्ता श्री कुमार सुरेश ने कहा कि आज के व्यंग्यकारों में साहस नहीं बचा है और व्यंग्यकार जिन प्रवृतियों को जी रहा है उन्हीं पर व्यंग्य लिख रहा है। व्यंग्य लेखन परिश्रम की मांग करता है। 

द्वितीय सत्र में व्यंग्य पाठ सत्र के अध्यक्ष मंडल में प्रो. हरिमोहन बुधौलिया, मलय जैन और विजी श्रीवास्तव सम्मिलित थे। द्वितीय सत्र में जिन व्यंग्यकारों ने व्यंग्य पाठ किया उनमें डॉ. पिलकेंद्र अरोरा , कुमार सुरेश , शशांक दुबे , शान्तिलाल जैन, मलय जैन भोपाल, विजी श्रीवास्तव भोपाल, संदीप सृजन, ललित उपमन्यु इंदौर, रमेशचंद्र शर्मा, डॉ. हरीशकुमार सिंह, प्रेमचन्द द्वितीय, जगदीश ज्वलंत महिदपुर, आशीष दशोत्तर रतलाम, राजेन्द्र देवधरे दर्पण सम्मिलित थे।

आयोजन का शुभारम्भ डॉ. अनामिका सोनी की सरस्वती वंदना से हुआ। अतिथि स्वागत प्रेमचंद सृजनपीठ उज्जैन के निदेशक श्री मुकेश जोशी, दिनेश दिग्गज, देवेन्द्र सिंह सिसोदिया, केशव पंडया, डॉ. स्वामीनाथ पांडे ने किया। विमर्श सत्र में डॉ. रमण सोलंकी, बी .के शर्मा, डॉ. संदीप नाडकर्णी, डॉ. शेखर मेदमवार, डॉ. रमेश चांगेसिया प्रभात, डॉ. उर्मि शर्मा, मुकेश तिवारी, शैलेन्द्र व्यास स्वामी मुस्कुराके, अशोक भाटी, हेमंत भोपाले, डॉ.संतोष पंड्या, जगदीश शर्मा, सुगनचंद जैन, अरविन्द जैन, अनिल कुरेल, शैलेश दुबे, प्रबोध पंडया, सुरेन्द्र सर्किट, राहुल शर्मा, अनिल गुप्ता, महेश त्रिवेदी, अजय शर्मा, संगीता तल्लेरा, खुशबु बाफना, डॉ नेत्रा रावणकर, अनिल गुप्ता, ईश्वर पटेल, दिनेश रावल, राजेश राज आदि उपस्थित थे। प्रथम सत्र का आभार प्रदर्शन मुकेश जोशी और द्वितीय सत्र में आभार दिनेश दिग्गज ने व्यक्त किया, सञ्चालन डॉ.हरीशकुमार सिंह ने किया ।

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