म.प्र. साहित्य अकादमी भोपाल द्वारा नारदमुनि पुरस्कार से अलंकृत

जितेन्द्र निर्मोही की कृति मेरे गीत और नवगीत का लोकार्पण

जितेन्द्र निर्मोही की कृति मेरे गीत और नवगीत का लोकार्पण 
यह समय पाठकों से बेईमानी का नहीं - सुभाष चंदर

कोटा। यह समय पाठकों से बेईमानी का नहीं है, वर्तमान समय का पाठक बड़ा सावचेत है। गीत अपने समय की आंतरिक हलचल और लयात्मकता का अनुवाद है। जितेन्द्र निर्मोही इस समय के बड़े गीतकार हैं। वो अपने गीतों को अहसासों की खेती के साथ प्रस्तुत करते हैं। मैं भी उन गीतों का प्रशंसक हूं जो ईमानदारी से लिखे जाएं,यह वक्तव्य गाजियाबाद से पधारे देश के जाने-माने व्यंग्यकार और समालोचक सुभाष चंदर ने रंगनाथन सभागार मंडल पुस्तकालय कोटा में प्रस्तुत किए।एस रंगनाथन सभागार में बाहर से पधारे और हाड़ौती अंचल के गीतकारों की उपस्थिति में जितेन्द्र निर्मोही की कृति "मेरे गीत और नवगीत" का लोकार्पण समारोह सम्पन्न हुआ। नई दिल्ली से पधारे समारोह के अध्यक्ष रामकिशोर उपाध्याय ने कहा जितेन्द्र निर्मोही बच्चन की परिवर्तित श्रृंखला के बड़े गीतकार हैं वह इस संकलन में गीत की रचना प्रक्रिया भी बताते हैं "कैसे कोई गीत बना" उन्होंने कहा कि जितेन्द्र निर्मोही अपने गीतों में देशज शब्दों का प्रयोग भी करते हैं "पनिया वाली शाम सुहानी आई है, धनिया रानी लौट आओ ना घर को" गीत इस बात की मिसाल है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में उन्होंने कितने ही गीतकारों के गीत से संबंधित उध्दरण प्रस्तुत किए। उन्होंने कहा यह भव्य लोकार्पण समारोह एक तरह गीत की कार्यशाला हो गया है कोटा महानगर में गीत पर बात होना देशभर में संदेश जाना है।

लोकार्पण समारोह में जितेन्द्र निर्मोही द्वारा रचित सरस्वती वंदना डॉ शशि जैन द्वारा गाई गई और हाड़ौती में वंदना श्यामा शर्मा ने प्रस्तुत की समारोह में वंदना आचार्य द्वारा जितेन्द्र निर्मोही के गीत "सांझ पागल तो नहीं, तुम हो गई हो" और "जिंदगी का गीत भी गाती रहो तुम" समुधर कंठ से गाया इस समय मंच सहित श्रोताओं ने उन्हें खड़े होकर सम्मानित दिया। "विदाई गीत" की प्रस्तुति इंजीनियरिंग कॉलेज की छात्रा अनंदिता शर्मा ने प्रस्तुत किया। संचालन नहुष व्यास ने किया और धन्यवाद हर्ष मित्र शर्मा ने दिया।

अपने स्वागत भाषण में पुस्तकालय अधीक्षक डॉ दीपक श्रीवास्तव ने कहा कि यह कोटा का सौभाग्य है कि बहार से पधारे विद्वान यहां आकर गीत पर चर्चा करेंगे। विश्व कविता दिवस 2026 में कोटा से विश्व भर में संदेश जाएगा। यह बहुत बदलाव इस सभागार में विभिन्न विधाओं को लेकर विभिन्न भाषाओं के साहित्य के चौरासी सत्र सम्पन्न हुए। वर्तमान समय में जब गीत पर कहीं कोई बात नहीं होती अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले गीतकार जितेन्द्र निर्मोही के गीतों पर वर्तमान गीत परंपरा के साथ साथ बात होना अभिनंदन योग्य है।बीज वक्तव्य देते हुए समालोचक और कथाकार विजय जोशी ने कहा कि गीत का निकष नौ वी या दसवीं शताब्दी से होकर यहां तक की यात्रा है। सामवेद और गीता भी उपनिषद परंपरा में महत्वपूर्ण गीत लिखने की प्रक्रिया को बताते हैं। गीत शब्दों की लयात्मकता के साथ गाया जाता है तो अपना प्रभाव छोड़ता है यही गीत की ताकत है। आजादी के बाद हिन्दी गीतों में इस अंचल से डॉ दया कृष्ण विजय और बशीर अहमद मयूख देश में अपना योगदान देते हैं उसी परंपरा में जितेन्द्र निर्मोही आते हैं।वो पूरी तरह गीत परंपरा का निर्वाह करते हैं भक्ति काल देश की विशिष्ट गीत परंपरा का उदाहरण है। इस अवसर विशिष्ट अतिथि डॉ कपिल गौतम ने कहा मैंने बड़ी गंभीरता से कृति "मेरे गीत और नवगीत" पढ़ी है। जितेन्द्र निर्मोही लोक शास्त्र में डूबकर अपने गीतों का अवगाहन करते हैं।वो आजादी के बाद देश की परिस्थितियों को बताते हैं "भीम का गला अवरुद्ध है,भीष्म अपने शासकों से क्रुद्ध है", तो तो करता,खाद,किसानी छप्पर हमने विपदा के दिन झेले से किसान की पीड़ा को भी अभिव्यक्त करते हैं। उनके गीतों में वृद्ध है "बहुत तपे पेड़ आंगन के" तो बेटी की बात भी करते हैं जितेन्द्र निर्मोही बहुआयामी गीतकार हैं। गीत मनुष्य के भीतर की आग है जो समय आने पर सामने आती है। मुख्य वक्ता डॉ विवेक मिश्र ने कृति पर बोलते हुए कहा कि यह कृति लेखकिय अनुष्ठान का प्रतिफल है इस संकलन में जितेन्द्र निर्मोही अपने विद्यार्थी काल के गीतों को सजोना नहीं भूलते उनके गीतों का लोहा पूरा देश जानता है। उन्हें कोटा महानगर में गीतों को सुनने और समझने वाली एक पीढ़ी तैयार की है वह एक साहित्यिक उड़ान प्रदत्त कराने वाले बड़े साहित्यकार हैं। सबसे बड़ी बात उनके गीतों की यह है कि वो हिंदी गीतों में उर्दू अदब की गंगा जमनी तहजीब भी बहाते हैं और देशज हाड़ौती शब्दों को मोतियों की तरह गूंथ देते हैं। गीत साहित्य की कठीन तपस्या का नाम है और उसका प्रतिफल है यह कृति "मेरे गीत और नवगीत" जिसका देश में व्यापक स्वागत होगा।

इस अवसर पर गीतकार जितेन्द्र निर्मोही अपने मुक्तक, गीतों के मुखड़े सुनाते हुए अपने अग्रज कवियों बाल कवि बैरागी, चंद्र सेन विराट,नमोनाथ अवस्थी, कुंवर बैचेन, अजहर हाशमी को याद करते हुए उनसे जुड़े संस्मरण सुनाए। उन्होंने कहा मेरे गीत मुझे मौत के सामने मुस्कराते हुए रहने के लिए कहते हैं।

जितेन्द्र निर्मोही का स्वागत काव्य मधुबन की ओर से अतुल कनक ने, आर्यन लेखिका मंच की और से रेखा पंचोली, श्यामा शर्मा, डॉ युगल सिंह ने, रंगितिका संस्थान की ओर से रीता गुप्ता, साधना शर्मा, वंदना आचार्य ने,समरस साहित्य संस्थान की ओर से डॉ शशि जैन, महेश पंचोली, डॉ वैदेही गौतम, राजेन्द्र जैन ने, अखिल भारतीय साहित्य परिषद की ओर से रामेश्वर शर्मा रामू भैया और विष्णु शर्मा हरिहर ने,रंग प्रभात संस्था की ओर से संदीप द्विवेदी ने, मधुकर काव्य सृजन संस्थान कोटा की ओर से जे पी मधुकर,बालू लाल वर्मा, कवि प्रेम शास्त्री, बाबू बंजारा, मुरली धर गौड़, सुरेश पंडित ने, रंग कर्म संस्थान की ओर से राम शर्मा, विजय महेश्वरी आदि ने सम्मान किया। 

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