रचनात्मक कल्पना की आवश्यकता है समकालीन लघुकथा को -प्रो भाटिया
उज्जैन। सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय की हिंदी अध्ययनशाला द्वारा पीएम उषा योजना के अंतर्गत एमपी कॉन, भोपाल के सहयोग से छह दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। बुधवार को समकालीन लघुकथा: अंतर्वस्तु, भाषा और शिल्प के संदर्भ में पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी सम्पन्न हुई, जिसके मुख्य अतिथि वरिष्ठ लेखक डॉ अशोक भाटिया करनाल, हरियाणा थे। अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्री सूर्यकांत नागर, इंदौर ने की। सारस्वत अतिथि वरिष्ठ लघुकथाकार श्री माधव नागदा, उदयपुर, राजस्थान, डॉ पुरुषोत्तम दुबे, इंदौर, श्री संतोष सुपेकर, प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे, कुलानुशासक प्रो शैलेंद्र कुमार शर्मा, साहित्यकार श्रीराम दवे, प्रो जगदीश चंद्र शर्मा, वसुधा गाडगिल, अंतरा करवड़े आदि ने संगोष्ठी में प्रकाश डाला। देश के शीर्षस्थ लघुकथाकारों को अंग वस्त्र, सूत की माला, प्रतीक चिह्न एवं साहित्य भेँट कर उनका सारस्वत सम्मान किया गया। आयोजन में श्री संतोष सुपेकर के लघुकथा संग्रह अविश्वासचक्र का लोकार्पण किया गया।
मुख्य अतिथि डॉ अशोक भाटिया, करनाल ने अपने उद्बोधन में कहा कि रचनाकार रचना में उतरता है, तब वह संवेदना को निकाल कर लाता है और अपनी लघुकथा में उतारता है। रचना पाठक से ही होती है और अंतिम बात किसी भी रचना में पाठक के लिए ही कही जाती है। जब लघुकथा घटना कथा बन जाती है, उसमें वह रचनात्मकता नहीं बचती। समकालीन लघुकथा को रचनात्मक कल्पना की आवश्यकता है। आपका चिंतन ऐसा हो जो एक वाक्य या संक्षिप्त शब्दों में पूरी बात को, पूरे भाव को समझा दे। लेखक में लिखने की तड़प, वह बेचैनी होनी चाहिए जो आपको रचना करने पर मजबूर करें।
अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्री सूर्यकांत नागर, इंदौर ने कहा कि लघुकथा रचना गहन साधना चाहती है। रचना में किसी प्रकार का बंधन नहीं होता बल्कि हर विधा का अपना अनुशासन होता है। रचना ऐसी होनी चाहिए जिसमें कम से कम शब्दों में अपनी बात को कहा जा सके। हमारी शक्ति एक अच्छी लघुकथा लिखने में होती है। लघुकथा पाठक के साथ संवाद करती है।
सारस्वत अतिथि श्री माधव नागदा, उदयपुर, ने कहा कि विचार से एकमत होकर ही एक लघुकथा की अंतर्वस्तु बनती है। लघुकथा में रिश्तों की गरिमा, नारी की दशा, आर्थिक असमानता, राजनीति, समसामयिक विषयों को आधार बनाया जा रहा है। आज के समय में हमारी संवेदनशीलता खत्म होती जा रही है। लघुकथा संवेदनशीलता को अपने में समेटे हुए समाज का चित्रण करती है।
डॉ पुरुषोत्तम दुबे, इंदौर ने लघुकथा के समकालीन परिदृश्य और उसकी समस्या और मूल्य पर चर्चा करते हुए कहा कि समकालीन परिदृश्य के बीच से हमें लघुकथा के अश्कों को निकालना चाहिए। लघुकथा विसंगतियों, मानवीय संवेदनाओं, वर्तमान परिदृश्य पर लिखी जाती है। कठोर सत्य जो हम देखते हैं जीते हैं उस पर लघुकथा लिखना चाहिए।
कुलशासक प्रो शैलेंद्रकुमार शर्मा ने कहा कि समकालीन साहित्य में लघुकथाकारों ने अपनी संवेदनशीलता, पैनी दृष्टि और मारक अभिव्यक्ति क्षमता से इस विधा को नए आयाम दिए हैं। लघुकथा सामाजिक परिवर्तन को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। मूल्यों के क्षरण के दौर में आज अनेक लघुकथाकार तीखा शर-संधान कर रहे हैं। उन्होंने न केवल पारिवारिक और सामाजिक विसंगतियों को उकेरा है, बल्कि अस्मिता विमर्श, वैश्विक मुद्दों, राजनीति, और अर्थतंत्र के प्रभावों को लघुकथा के छोटे कैनवास पर बखूबी उतारा है।
श्री संतोष सुपेकर ने अपने उद्बोधन में कहा कि लघुकथा में जीवन की विसंगतियों को दर्शाया जाता है। समकालीन लघुकथा वह है जिसने आम आदमी की खोज की, यथार्थ और समाज को चित्रित किया है। लघुकथा में कल्पना अतीत विषयक नहीं होनी चाहिए। ऐसे विषय होने चाहिए जो लोगों को और समाज को अपने अनुभव लगे। श्रीमती वसुधा गाडगिल इंदौर ने अपने उद्बोधन में बताया कि लघुकथा में कम शब्दों में गहन अर्थ होता है। उसकी अंतर्वस्तु व्यापक और बहुआयामी होती है। समाज में व्याप्त बुराइयों और संघर्ष का चित्रण, स्त्री की समस्या का चित्रण लघु कथा में किया जाता है।
तकनीकी सत्र की अध्यक्षता श्रीराम दवे ने की। प्रवासी साहित्यकार श्री सुरेश चंद्र शुक्ल शरद आलोक, ओस्लो, नॉर्वे ने अपनी दो लघुकथाएं सुनाईं। श्रीमती वसुधा गाडगिल, श्रीमती अंतरा करवड़े, श्रीमती मीरा जैन, श्री मानसिंह शरद, डॉ नेत्रा रावणकर, श्री मुकेश जोशी, सीमा पंड्या, किरण शुक्ला आदि ने सत्र में विचार व्यक्त किए। यह संगोष्ठी विख्यात मनीषी आचार्य कमलेशदत्त त्रिपाठी की स्मृति को समर्पित थी। सुंदरलाल मालवीय ने जयशंकर प्रसाद के गीत की प्रस्तुति की। कार्यक्रम का संचालन शोधार्थी पूजा परमार और डॉ नेत्रा रावणकर ने किया और आभार प्रदर्शन प्रो. जगदीशचंद्र शर्मा एवं डॉ प्रतिष्ठा शर्मा ने किया।


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